
जमशेदपुर।
पूर्व मुख्यमंत्री सह भाजपा नेता चम्पाई सोरेन ने झारखंड सरकार पर पेसा (PESA) अधिनियम की नियमावली को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं। जमशेदपुर के परिसदन में आयोजित संवाददाता सम्मेलन में उन्होंने कहा कि राज्य सरकार ने पेसा के नाम पर आदिवासी समाज को धोखा दिया है और जो नियमावली लाई गई है, वह पूरी तरह से आदिवासी विरोधी है।

नियमावली को जानबूझकर छिपाया गया
चम्पाई सोरेन ने कहा कि पिछले महीने सरकार ने पेसा अधिनियम लागू करने की घोषणा की, लेकिन उसकी नियमावली को लंबे समय तक छिपाकर रखा। हाई कोर्ट के बार-बार दबाव और विपक्ष के आंदोलन के बाद जब नियमावली सामने आई, तब यह स्पष्ट हो गया कि सरकार इसे क्यों छिपा रही थी। उन्होंने कहा कि पुरानी नियमावली से तुलना करने पर साफ दिखता है कि सरकार ने पेसा के मूल स्वरूप को ही बदल दिया है।
रूढ़िजन्य विधि और धार्मिक प्रथाएं गायब
उन्होंने बताया कि सबसे बड़ा बदलाव यह है कि नई नियमावली से रूढ़िजन्य विधि और धार्मिक प्रथाओं जैसे शब्द हटा दिए गए हैं। जबकि भारतीय संविधान की धारा 13(3)(क) में रूढ़िजन्य प्रथाओं को स्पष्ट मान्यता दी गई है। उन्होंने सवाल उठाया कि ग्राम सभा के गठन से यदि परंपरागत व्यवस्था को हटा दिया जाएगा, तो पेसा कानून का औचित्य ही क्या रह जाएगा।
ग्राम सभा के अधिकारों में कटौती
चम्पाई सोरेन ने आरोप लगाया कि नई नियमावली में ग्राम सभाओं के अधिकारों को गंभीर रूप से सीमित कर दिया गया है। पहले अधिसूचित पारंपरिक क्षेत्रों में जल, जंगल, जमीन और लघु खनिजों पर ग्राम सभा का अधिकार था, जिसे अब केवल सरना, मसना, जाहेरथान और सांस्कृतिक भवनों तक सीमित कर दिया गया है। उन्होंने कहा कि शेड्यूल एरिया में रह रहे आदिवासियों को उनके प्राकृतिक संसाधनों से अलग करना पेसा की आत्मा के खिलाफ है।
उपायुक्त को दिए गए अधिकांश अधिकार
उन्होंने कहा कि गठन से लेकर विवाद निपटारे तक अधिकतर अधिकार उपायुक्त को सौंप दिए गए हैं। पहले ग्राम सभा राज्य की योजनाओं और DMFT जैसे कार्यक्रमों को मंजूरी देती थी, अब केवल सहमति ली जाएगी और 30 दिन में जवाब न मिलने पर उसे स्वीकृत मान लिया जाएगा।
खनिज, भूमि और विस्थापन पर सवाल
चम्पाई सोरेन ने कहा कि बालू, मिट्टी, पत्थर और मोरम जैसे लघु खनिजों पर ग्राम सभा का अधिकार खत्म कर दिया गया है। CNT/SPT एक्ट के उल्लंघन में भूमि वापसी का अधिकार भी हटा दिया गया है। उन्होंने चांडिल डैम, टाटा लीज और औद्योगीकरण के नाम पर हो रहे विस्थापन का मुद्दा उठाते हुए कहा कि टाटा लीज के नवीनीकरण की प्रक्रिया तुरंत रोकी जानी चाहिए।
पुरजोर विरोध की चेतावनी
उन्होंने कहा कि नियमावली बनाते समय सरकार को शराब दुकानें और भट्ठियां तो याद रहीं, लेकिन आदिवासियों और विस्थापितों के अधिकारों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि आदिवासी समाज के अधिकार छीनने की इस कोशिश का हर स्तर पर पुरजोर विरोध किया जाएगा।


