
लाखों अभ्यर्थियों के भविष्य से जुड़ा है मामला
जमशेदपुर।
झारखंड शिक्षक पात्रता परीक्षा (J-TET) में क्षेत्रीय भाषाओं की भागीदारी को लेकर विवाद और गहराता जा रहा है। इसी कड़ी में ‘भाषा बचाओ संघर्ष समिति, झारखंड प्रदेश’ के एक विशेष प्रतिनिधिमंडल ने राज्य के वित्त मंत्री राधा कृष्ण किशोर से मुलाकात की और उन्हें एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा। इस ज्ञापन के माध्यम से J-TET परीक्षा में भोजपुरी, मगही और अंगिका भाषाओं को तत्काल प्रभाव से शामिल करने की पुरजोर मांग की गई है। समिति का स्पष्ट रूप से कहना है कि इन प्रमुख भाषाओं की उपेक्षा राज्य के लाखों छात्र-छात्राओं की भावनाओं और उनके भविष्य के साथ घोर अन्याय है।
सांस्कृतिक पहचान की अनदेखी से युवाओं में आक्रोश
समिति के प्रतिनिधियों ने जोर देते हुए कहा कि भोजपुरी, मगही और अंगिका केवल बोलचाल की भाषाएं नहीं हैं, बल्कि यह झारखंड में बसने वाले करोड़ों लोगों की सांस्कृतिक पहचान, परंपरा और गहरी सामाजिक विरासत का अहम हिस्सा हैं। इन्हें J-TET जैसी महत्वपूर्ण राज्य स्तरीय परीक्षा से बाहर रखना भाषाई असमानता को सीधे तौर पर बढ़ावा देना है। विश्व भोजपुरी विकास परिषद के महासचिव मिथिलेश श्रीवास्तव ने अपनी बात रखते हुए कहा कि राज्य के एक बड़े हिस्से में लोग इन भाषाओं को बोलते और समझते हैं, इसके बावजूद सरकार द्वारा इन्हें लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है। क्षेत्रीय भाषाओं को उनका उचित सम्मान न मिलने से युवाओं के बीच भारी असंतोष पनप रहा है।
संविधान के तहत समान अवसर की मांग
भाषा बचाओ संघर्ष समिति के संयोजक कन्हैया सिंह ने संविधान का हवाला देते हुए कहा कि हमारा संविधान सभी भाषाओं और संस्कृतियों को समान अधिकार और सम्मान देने की पैरवी करता है। ऐसे में J-TET से इन भाषाओं को बाहर रखना समान अवसर के मौलिक सिद्धांत के बिल्कुल विपरीत है। वहीं, संपूर्ण भोजपुरी विकास मंच के अध्यक्ष शशि मिश्रा ने बताया कि क्षेत्रीय भाषाओं की इस तरह की अनदेखी राज्य के सामाजिक और सांस्कृतिक संतुलन के लिए भविष्य में बेहद घातक साबित हो सकती है। सरकार को भाषाई विविधता को मजबूत करने के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए। भोजपुरी नव चेतना मंच के अप्पू तिवारी ने चेतावनी दी कि यदि सरकार शीघ्र ही कोई सकारात्मक निर्णय नहीं लेती है, तो पूरे प्रदेश में लोकतांत्रिक तरीके से एक व्यापक जनआंदोलन की शुरुआत की जाएगी।
वित्त मंत्री ने दिया सकारात्मक पहल का आश्वासन
प्रतिनिधिमंडल की सभी बातों और चिंताओं को ध्यानपूर्वक सुनने के बाद वित्त मंत्री राधा कृष्ण किशोर ने उन्हें आश्वस्त किया। वित्त मंत्री ने यह स्वीकार किया कि क्षेत्रीय भाषाओं का सम्मान और उनका संरक्षण समाज के लिए बेहद आवश्यक है। उन्होंने प्रतिनिधिमंडल को यह भरोसा दिलाया कि इस गंभीर विषय को सरकार के उचित फोरम पर मजबूती के साथ रखा जाएगा और सरकारी स्तर पर इसके समाधान के लिए हर संभव सकारात्मक पहल करने का पूरा प्रयास किया जाएगा। अब अभ्यर्थियों की नजरें सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं।


