
चाईबासा/जमशेदपुर: आदिवासी संस्कृति, भाषा, संगीत और पारंपरिक ज्ञान को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फलक पर स्थापित करने वाले महान विभूति पद्मश्री डॉ. रामदयाल मुण्डा के विचारों को नई पीढ़ी तक पहुँचाने के उद्देश्य से कोल्हान विश्वविद्यालय में एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA) क्षेत्रीय केंद्र, रांची और कोल्हान विश्वविद्यालय, चाईबासा के संयुक्त तत्वावधान में विश्वविद्यालय सभागार में ‘द्वितीय पद्मश्री रामदयाल मुण्डा स्मृति व्याख्यान’ का भव्य आयोजन संपन्न हुआ। इस अकादमिक विमर्श में शिक्षाविदों, साहित्यकारों और शोधार्थियों ने उनके बहुआयामी व्यक्तित्व और आदिवासी अस्मिता पर अपने विचार साझा किए।


इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA) क्षेत्रीय केंद्र, रांची और कोल्हान विश्वविद्यालय, चाईबासा के संयुक्त तत्वावधान में द्वितीय पद्मश्री रामदयाल मुण्डा स्मृति व्याख्यान का आयोजन.
प्रख्यात साहित्यकार एवं चिंतक श्री महादेव टोप्पो ने मुख्य वक्ता के रूप में शिरकत करते हुए रामदयाल मुण्डा के जीवन-दर्शन और सांस्कृतिक योगदान पर डाला प्रकाश.
कोल्हान विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. (डॉ.) अंजिला गुप्ता और IGNCA रांची के क्षेत्रीय निदेशक डॉ. कुमार संजय झा ने भी कार्यक्रम को किया संबोधित.
कार्यक्रम में रामदयाल मुण्डा के नाम पर एक समर्पित ‘पीठ’ (Chair) की स्थापना की मांग उठाई गई, जिससे आदिवासी ज्ञान-परंपरा पर शोध को बढ़ावा मिल सके
“जड़ों से जुड़े रहकर वैश्विक पहचान बनाना रामदयाल मुण्डा की विशेषता थी”
मुख्य वक्ता महादेव टोप्पो के विचार: कार्यक्रम के मुख्य वक्ता प्रख्यात साहित्यकार एवं चिंतक श्री महादेव टोप्पो ने कहा कि पद्मश्री रामदयाल मुण्डा के व्यक्तित्व में “जे नाची से बांची” जैसी आदिवासी जीवन-दृष्टि की गहरी अभिव्यक्ति मिलती है। अमेरिका जैसे विकसित परिवेश में लंबे समय तक रहने के बावजूद वे अपनी जड़ों और सांस्कृतिक अस्मिता से कभी दूर नहीं हुए। उन्होंने आदिवासी भाषाओं और लोकपरंपराओं को भारतीय ज्ञान-परंपरा का अभिन्न हिस्सा बनाया।
कुलपति डॉ. अंजिला गुप्ता का संबोधन: कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रही कोल्हान विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. (डॉ.) अंजिला गुप्ता ने कहा कि रामदयाल मुण्डा शिक्षा, साहित्य और सामाजिक चेतना का अद्भुत संगम थे। उन्होंने अकादमिक ज्ञान को समाज के जीवन से जोड़ने का अनूठा उदाहरण पेश किया।
विशेषज्ञों ने उठाई रामदयाल मुण्डा पीठ (Chair) की स्थापना की मांग
डॉ. कुमार संजय झा के सुझाव: इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केंद्र, रांची के क्षेत्रीय निदेशक डॉ. कुमार संजय झा ने कहा कि आज जब जनजातीय भाषाएँ और लोकपरंपराएँ संरक्षण की चुनौती का सामना कर रही हैं, ऐसे में रामदयाल मुण्डा के विचार और भी प्रासंगिक हो जाते हैं। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि उनके नाम पर एक समर्पित ‘पीठ’ (Chair) की स्थापना होनी चाहिए, जो आदिवासी ज्ञान-परंपरा पर शोध का प्रमुख केंद्र बने।
विशिष्ट अतिथियों की सहभागिता: कार्यक्रम के दौरान डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय के समन्वयक डॉ. बिनोद कुमार ने जनजातीय भाषाओं के दस्तावेजीकरण पर जोर दिया, जबकि मानवविज्ञान विभाग की डॉ. मीनाक्षी मुण्डा ने कार्यक्रम की पृष्ठभूमि और पद्मश्री मुण्डा के कृतित्व पर प्रकाश डाला।
इस व्याख्यान में कोल्हान विश्वविद्यालय के लगभग 500 शिक्षक, शोधार्थी, विद्यार्थी और कला-संस्कृति से जुड़े गणमान्य लोग उपस्थित रहे




