
सरायकेला/नई दिल्ली: सरायकेला-खरसावां (Seraikela-Kharsawan) की माटी से उपजी छऊ कला और उसके मुखौटों ने अब देश के सबसे बड़े सांस्कृतिक मंच पर अपनी अमिट पहचान दर्ज करा ली है। गुरुवार, 13 अगस्त 2026 को नई दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित एक भव्य समारोह में, सरायकेला शैली के प्रसिद्ध छऊ मुखौटा शिल्पी गुरु सुशांत कुमार महापात्र को देश की सर्वोच्च संवैधानिक हस्ती, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू (President Draupadi Murmu) के हाथों प्रतिष्ठित ‘संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार’ (Sangeet Natak Akademi Award) से सम्मानित किया गया। कभी बांस की टोकरी और स्थानीय साधनों से शुरू हुई यह कला आज महापात्र परिवार की दशकों की साधना के दम पर राष्ट्रपति भवन तक का सफर तय कर चुकी है।


सरायकेला के प्रसिद्ध छऊ मुखौटा शिल्पी गुरु सुशांत कुमार महापात्र को दिल्ली के विज्ञान भवन में मिला प्रतिष्ठित ‘संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार’।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने छऊ एवं पारंपरिक मुखौटा शिल्प में उनके उत्कृष्ट योगदान और साधना के लिए किया सम्मानित।
1925 में गुरु प्रसन्न कुमार महापात्र द्वारा शुरू की गई आधुनिक मुखौटा कला को सुशांत महापात्र ने न्यूयॉर्क, बर्लिन और वियना तक पहुंचाई।
महापात्र परिवार की तीसरी पीढ़ी भी संभाल रही है विरासत, सुशांत महापात्र के पुत्र सुमित महापात्र भी जुड़े हैं मुखौटा निर्माण से।
8 साल की उम्र में शुरू हुआ सफर, पीढ़ियों की है विरासत
सरायकेला शैली के छऊ नृत्य (Seraikela Chhau) में मुखौटा केवल चेहरे को ढकने का आवरण नहीं, बल्कि पात्र के भाव, चरित्र और प्रस्तुति की जान होता है।
1925 में हुई शुरुआत: वर्ष 1925 में गुरु प्रसन्न कुमार महापात्र ने मिट्टी से आधुनिक मुखौटा तैयार कर उसे सरायकेला छऊ में स्थापित किया था।
बचपन की साधना: इसी विरासत को आगे बढ़ाते हुए सुशांत महापात्र ने महज आठ वर्ष की उम्र में मुखौटा निर्माण की बारीकियां सीखनी शुरू कर दी थीं। आकार गढ़ना, मिट्टी को रूप देना, चेहरे के भाव उभारना और रंग-संयोजन करना उनके जीवन की साधना बन गया और उन्होंने पारंपरिक शैली को बरकरार रखते हुए अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई।
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न्यूयॉर्क से लेकर वियना तक मुखौटों की गूंज
सुशांत महापात्र के बनाए छऊ मुखौटों की पहचान सिर्फ सरायकेला या झारखंड तक सीमित नहीं है। उनके मुखौटों की प्रदर्शनी अमेरिका के न्यूयॉर्क (New York), जर्मनी के बर्लिन (Berlin) और ऑस्ट्रिया के वियना (Vienna) सहित देश के बड़े महानगरों (दिल्ली, मुंबई और कोलकाता) में भी लग चुकी है। उनके हुनर का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके द्वारा निर्मित एक खास मुखौटा देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) को भी भेंट किया जा चुका है। (इससे पूर्व वर्ष 2022 में ओडिशा के जगन्नाथपुरी में आयोजित अंतरराष्ट्रीय मेगा डांस फेस्टिवल ‘अप्सरा-2022’ में उन्हें ‘गुरु ब्रह्मा अवार्ड’ से भी सम्मानित किया गया था।)
तीसरी पीढ़ी के हाथों में महफूज है छऊ की पहचान
यह सम्मान केवल एक कलाकार का नहीं, बल्कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती रही सरायकेला की सांस्कृतिक स्मृति का सम्मान है। मिट्टी से शुरू हुई यह कलात्मक यात्रा अब महापात्र परिवार की तीसरी पीढ़ी तक पहुंच चुकी है। वर्तमान में सुशांत महापात्र के पुत्र सुमित महापात्र भी पूरे समर्पण के साथ छऊ मुखौटा निर्माण से जुड़े हैं।
सरायकेला का छऊ मुखौटा सिर्फ एक कलाकृति नहीं, बल्कि इतिहास, परंपरा और मंचीय अभिव्यक्ति का संगम है। राष्ट्रपति के हाथों मिला यह राष्ट्रीय सम्मान उस विरासत की लंबी यात्रा का वह पड़ाव है, जिस पर आज पूरे झारखंड को गर्व है।


