
सरायकेला- खऱसांवा।

झारखंड के सरायकेला-खरसावां जिले से एक बेहद सुखद और प्रेरणादायक खबर सामने आई है। कल तक जो बंजर जमीनें किसानों के लिए गरीबी और लाचारी का कारण थीं, आज वहां हरियाली लहलहा रही है। नाबार्ड (NABARD) और टाटा स्टील फाउंडेशन (TSF) की ‘वादी परियोजना’ ने आदिवासी किसानों की तकदीर पूरी तरह बदल दी है। सही तकनीकी मार्गदर्शन और मजबूत इच्छाशक्ति के दम पर आज यहां के किसान लखपति बन रहे हैं।
एक एकड़ बंजर जमीन से सफलता का सफर
जिले के रांगामाटिया गांव के रहने वाले सोनाराम सोरेन की कहानी इस बदलाव का सबसे बड़ा उदाहरण है। महज पांच साल पहले तक सोनाराम का जीवन भारी संघर्षों से घिरा था। परिवार के पास एक एकड़ जमीन थी, लेकिन पूरी तरह बंजर होने के कारण वे खेती नहीं कर पाते थे। आर्थिक तंगी के कारण बच्चों की शिक्षा भी प्रभावित हो रही थी। लेकिन आज सोनाराम आर्थिक रूप से इतने सशक्त हो चुके हैं कि उन्होंने हाल ही में अपनी बेटी का दाखिला चाईबासा के एक प्रतिष्ठित संस्थान में करवाया है।
16 परिवारों ने मिलकर शुरू की उच्च मूल्य वाली बागवानी
गांव में बदलाव की शुरुआत तब हुई जब टाटा स्टील फाउंडेशन और नाबार्ड ने हस्तक्षेप किया। सोनाराम के साथ-साथ अगल-बगल के 16 परिवारों को जोड़कर एक समूह बनाया गया, जिससे कुल 16 एकड़ जमीन कृषि के लिए उपलब्ध हो गई। किसानों को पारंपरिक खेती की जगह उच्च मूल्य वाली बागवानी के लिए प्रेरित किया गया। खेतों में आम्रपाली और मल्लिका किस्म के आम तथा एल-49 किस्म के अमरूद के पौधे लगाए गए। इसके अलावा, खेतों की खाली जगहों पर सब्जी की खेती भी शुरू की गई, जिससे आय के नए स्रोत खुले।
36 गांवों के 388 परिवारों की बदली तकदीर
यह सफलता केवल रांगामाटिया गांव तक सीमित नहीं है। सरायकेला-खरसावां जिले के 36 गांवों में 379 एकड़ जमीन पर 388 परिवार आज वादी परियोजना का सीधा लाभ उठा रहे हैं। इन क्षेत्रों में 25,000 से अधिक आम और 10,000 अमरूद के पौधे लगाए गए हैं। आज इस इलाके में आम का बंपर उत्पादन 5 लाख किलोग्राम के पार पहुंच गया है।
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‘उआल-बाहा एफपीसी’ से बिचौलियों का खेल खत्म
किसानों को उनकी मेहनत का पूरा दाम दिलाने और बिचौलियों का राज खत्म करने के लिए 250 किसानों को मिलाकर ‘उआल-बाहा फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी’ (FPC) का गठन किया गया है। अब गांव के पैक हाउस में ही फलों और सब्जियों की ग्रेडिंग होती है। इसके बाद इन उत्पादों को सीधे जमशेदपुर, सिनी और गम्हरिया की बड़ी मंडियों में ऊंचे दामों पर बेचा जाता है।
वादी परियोजना ने यह साबित कर दिया है कि अगर किसानों को सही दिशा मिले, तो वे अपने बच्चों के लिए सुनहरे भविष्य का निर्माण कर सकते हैं। यह कृषि क्रांति पूरे झारखंड के लिए एक शानदार मिसाल बन चुकी है।

