
जमशेदपुर: सोना देवी विश्वविद्यालय, घाटशिला में विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों में गुणवत्तापूर्ण शोध, नवाचार एवं अकादमिक दक्षता को बढ़ावा देने तथा उन्हें आधुनिक शोध-पद्धतियों एवं तकनीकी संसाधनों के प्रभावी उपयोग के लिए सक्षम बनाने के उद्देश्य से 26 सितंबर 2026 को एक विशेष Research Workshop का आयोजन किया गया। कार्यशाला का मुख्य केंद्र शोधार्थियों के शोध कौशल को विकसित करना, शोध की गुणवत्ता एवं मौलिकता को बढ़ाना तथा शोध को सामाजिक उपयोगिता से जोड़ना रहा।
वर्तमान समय में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में शोध एवं नवाचार की भूमिका निरंतर महत्वपूर्ण होती जा रही है। इसी परिप्रेक्ष्य में आयोजित इस कार्यशाला में शोधार्थियों को शोध के विभिन्न व्यावहारिक एवं अकादमिक पहलुओं की जानकारी प्रदान की गई। कार्यशाला में शोध विषय के चयन से लेकर शोध की गुणवत्ता, नवीनता, विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण, अकादमिक लेखन, शोध संसाधनों के उपयोग तथा तकनीकी दक्षता जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई।
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शोध केवल उपाधि प्राप्त करने का माध्यम नहीं : डॉ० शिवचन्द्र झा
कार्यक्रम का शुभारंभ डॉ० शिवचन्द्र झा, विभागाध्यक्ष, राजनीति विज्ञान विभाग, सोना देवी विश्वविद्यालय द्वारा किया गया। उन्होंने कार्यशाला के विषय एवं उद्देश्य का परिचय देते हुए कहा कि किसी भी विश्वविद्यालय की अकादमिक पहचान केवल उसके शिक्षण कार्य से नहीं, बल्कि उसके गुणवत्तापूर्ण शोध, नवाचार और ज्ञान-सृजन की क्षमता से भी निर्धारित होती है।
डॉ० शिवचन्द्र झा ने कहा कि शोधार्थी विश्वविद्यालय की शोध-परंपरा के महत्वपूर्ण आधार हैं। शोध केवल किसी उपाधि को प्राप्त करने की औपचारिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह नए ज्ञान की खोज, स्थापित धारणाओं के विश्लेषण और समाज की जटिल समस्याओं के समाधान का माध्यम है। इसलिए प्रत्येक शोधार्थी को अपने शोध विषय के प्रति गंभीरता, जिज्ञासा, अनुशासन और निरंतर अध्ययन की भावना रखनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि एक गुणवत्तापूर्ण शोध में मौलिकता, तार्किकता, प्रमाणिकता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सामाजिक प्रासंगिकता का होना आवश्यक है। शोधार्थियों को यह समझना होगा कि उनके शोध का उद्देश्य केवल शोध-प्रबंध तैयार करना नहीं, बल्कि ऐसा ज्ञान विकसित करना है जिसका अकादमिक एवं सामाजिक दोनों स्तरों पर महत्व हो।
उन्होंने पुनः कहा कि वर्तमान डिजिटल युग में शोध की प्रकृति तेजी से बदल रही है। डिजिटल डेटाबेस, ऑनलाइन जर्नल, शोध-संसाधन, आधुनिक तकनीक तथा विभिन्न डिजिटल टूल्स ने शोध के क्षेत्र को व्यापक बनाया है। ऐसे में शोधार्थियों के लिए पारंपरिक शोध-पद्धतियों के साथ-साथ आधुनिक तकनीकी एवं डिजिटल दक्षता हासिल करना भी आवश्यक है।
शोध में कौशल, दक्षता और नवाचार पर विशेषज्ञ का मार्गदर्शन
कार्यशाला के विशेषज्ञ प्रवीण कुमार महतो (Prabin Kumar Mahato), Faculty Member, Research and HPC Division, JCERT ने शोधार्थियों को संबोधित करते हुए Research Skills, Research Competency एवं Innovation पर विशेष रूप से विस्तार से चर्चा की।
उन्होंने कहा कि शोधार्थी को अपने विषय की गहरी समझ के साथ-साथ शोध की वैज्ञानिक एवं व्यवस्थित प्रक्रिया का ज्ञान होना चाहिए। उन्होंने शोध विषय के चयन, शोध समस्या की पहचान, शोध के उद्देश्य निर्धारण, साहित्य समीक्षा, आंकड़ों एवं तथ्यों के विश्लेषण, शोध निष्कर्ष तथा शोध लेखन से संबंधित महत्वपूर्ण बिंदुओं पर शोधार्थियों का मार्गदर्शन किया।
श्री महतो ने कहा कि शोध में केवल उपलब्ध सूचनाओं को संकलित करना पर्याप्त नहीं है। शोधार्थी को उपलब्ध ज्ञान का आलोचनात्मक एवं तार्किक विश्लेषण करते हुए उसमें नए दृष्टिकोण एवं नए निष्कर्ष जोड़ने का प्रयास करना चाहिए। उन्होंने शोध में नवाचार को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि वर्तमान प्रतिस्पर्धी एवं तकनीकी युग में वही शोध अधिक प्रभावी सिद्ध होता है जो किसी समस्या को नए दृष्टिकोण से समझने और उसके समाधान की दिशा में उपयोगी योगदान देने में सक्षम हो।
उन्होंने शोधार्थियों को अपनी शोध-दक्षता निरंतर विकसित करने, नवीनतम अकादमिक साहित्य से जुड़े रहने तथा उपलब्ध तकनीकी एवं डिजिटल संसाधनों का जिम्मेदारी और प्रभावी ढंग से उपयोग करने के लिए प्रेरित किया। कार्यशाला के दौरान शोधार्थियों ने विभिन्न प्रश्न एवं जिज्ञासाएं रखीं, जिनका विशेषज्ञ द्वारा विस्तारपूर्वक समाधान किया गया।
शोध एवं नवाचार विश्वविद्यालय की प्राथमिकता : कुलसचिव डॉ० नीत नयना
इस अवसर पर कुलसचिव डॉ० नीत नयना ने कहा कि किसी भी उच्च शिक्षण संस्थान की वास्तविक प्रगति उसके शोध एवं नवाचार की गुणवत्ता से भी मापी जाती है। सोना देवी विश्वविद्यालय विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों को ऐसा अकादमिक वातावरण उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध है, जहां वे स्वतंत्र रूप से सोच सकें, नए विचार विकसित कर सकें और अपने शोध के माध्यम से ज्ञान के क्षेत्र में योगदान दे सकें।
उन्होंने कहा कि इस प्रकार की कार्यशालाएं शोधार्थियों को कक्षा एवं पुस्तकीय ज्ञान से आगे बढ़कर व्यावहारिक शोध-कौशल और आधुनिक अकादमिक दृष्टिकोण विकसित करने का अवसर प्रदान करती हैं। उन्होंने शोधार्थियों से कार्यशाला में प्राप्त ज्ञान को अपने शोध कार्य में लागू करने तथा अपने शोध को अधिक गुणवत्तापूर्ण एवं प्रभावी बनाने का आह्वान किया।
गुणवत्तापूर्ण शोध से विश्वविद्यालय की अकादमिक पहचान मजबूत होती है : कुलपति
कुलपति प्रोफेसर डॉ० ब्रज मोहन पाट पिंगुवा ने कहा कि उच्च शिक्षा के वर्तमान परिदृश्य में शोध एवं नवाचार की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो गई है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय का दायित्व केवल विद्यार्थियों को डिग्री प्रदान करना नहीं, बल्कि उनमें ज्ञान की खोज, स्वतंत्र चिंतन, विश्लेषणात्मक क्षमता और नवाचार की भावना विकसित करना भी है।
उन्होंने शोधार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि वे अपने शोध कार्य को केवल पाठ्यक्रम या उपाधि तक सीमित न रखें, बल्कि उसे समाज और राष्ट्र की आवश्यकताओं से जोड़ने का प्रयास करें। उन्होंने नियमित अध्ययन, शोध साहित्य के गंभीर अध्ययन और विषय की नवीनतम प्रगति से स्वयं को अपडेट रखने पर जोर दिया।
कुलपति ने कहा कि सोना देवी विश्वविद्यालय शोधार्थियों के लिए निरंतर बेहतर अकादमिक अवसर उपलब्ध कराने तथा शोध एवं नवाचार की संस्कृति को मजबूत करने की दिशा में प्रतिबद्धता के साथ कार्य कर रहा है।
शोध समाज और राष्ट्र के विकास का माध्यम बने : कुलाधिपति श्री प्रभाकर सिंह
कार्यक्रम के अवसर पर कुलाधिपति श्री प्रभाकर सिंह ने शोधार्थियों को प्रेरित करते हुए कहा कि शोध किसी भी राष्ट्र की बौद्धिक एवं ज्ञान-सम्पदा को समृद्ध करने का महत्वपूर्ण माध्यम है। उन्होंने कहा कि शोधार्थियों को अपने शोध कार्य में मौलिकता, गुणवत्ता, अनुशासन, नवाचार और सामाजिक सरोकार को विशेष महत्व देना चाहिए।
उन्होंने कहा कि एक शोधार्थी का दायित्व केवल अपने विषय में विशेषज्ञता हासिल करना नहीं, बल्कि अपने ज्ञान को समाज के व्यापक हित से जोड़ना भी है। ऐसा शोध, जो सामाजिक समस्याओं को समझने, नए समाधान विकसित करने और समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने में योगदान देता है, उसकी उपयोगिता और प्रभाव दोनों व्यापक होते हैं।
श्री सिंह ने पुनः कहा कि आज दुनिया तेजी से तकनीकी एवं ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रही है। ऐसे समय में विश्वविद्यालयों को शोध एवं नवाचार के केंद्र के रूप में विकसित करना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि युवा शोधार्थियों में नई सोच, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और रचनात्मकता की अपार संभावनाएं हैं; आवश्यकता केवल उन्हें उचित मार्गदर्शन, संसाधन और अवसर प्रदान करने की है।
उन्होंने शोधार्थियों का आह्वान करते हुए कहा कि वे “सीखें, प्रश्न करें, विश्लेषण करें और नए ज्ञान का सृजन करें” की भावना के साथ अपने शोध कार्य को आगे बढ़ाएं। उन्होंने कहा कि शोध में निरंतरता, धैर्य और परिश्रम सफलता की महत्वपूर्ण आधारशिला हैं।
शोधार्थियों में दिखा उत्साह
कार्यशाला के दौरान शोधार्थियों में विशेष उत्साह देखने को मिला। उन्होंने विशेषज्ञ के साथ संवाद करते हुए शोध की प्रक्रिया, शोध कौशल, नवाचार, अकादमिक लेखन एवं आधुनिक तकनीकी संसाधनों से संबंधित विभिन्न प्रश्न पूछे। विशेषज्ञ ने शोधार्थियों की जिज्ञासाओं का समाधान करते हुए उन्हें शोध कार्य को अधिक व्यवस्थित, प्रमाणिक, मौलिक एवं प्रभावी बनाने के लिए आवश्यक सुझाव दिए।
कार्यशाला ने शोधार्थियों को यह समझने का अवसर प्रदान किया कि गुणवत्तापूर्ण शोध केवल विषय के ज्ञान पर निर्भर नहीं करता, बल्कि शोध कौशल, तकनीकी दक्षता, आलोचनात्मक चिंतन, नवाचार और निरंतर सीखने की प्रक्रिया पर भी आधारित होता है।
आभार ज्ञापन के साथ कार्यक्रम का समापन
कार्यक्रम के अंत में डॉ० कंचन सिन्हा ने विशेषज्ञ प्रवीण कुमार महतो, कुलाधिपति श्री प्रभाकर सिंह, कुलपति प्रोफेसर डॉ० ब्रज मोहन पाट पिंगुवा, कुलसचिव डॉ० नीत नयना, विश्वविद्यालय के शिक्षकों एवं सभी शोधार्थियों के प्रति आभार एवं धन्यवाद ज्ञापित किया।
उन्होंने कहा कि इस प्रकार की कार्यशालाएं शोधार्थियों को अकादमिक ज्ञान के साथ-साथ व्यावहारिक शोध-कौशल प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि कार्यशाला से प्राप्त ज्ञान एवं अनुभव शोधार्थियों के आगामी शोध कार्य को नई दिशा प्रदान करेगा तथा विश्वविद्यालय में गुणवत्तापूर्ण शोध, नवाचार एवं अकादमिक उत्कृष्टता की संस्कृति को और अधिक सुदृढ़ करने में सहायक सिद्ध होगा।
कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों के शिक्षक, शोधार्थी एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे


