
जमशेदपुर।पूर्व मुख्यमंत्री चम्पई सोरेन ने रविवार को एक्सएलआरआई प्रेक्षागृह में आयोजित आदिवासी महा दरबार से टाटा स्टील और राज्य सरकार के खिलाफ बड़ा ऐलान किया। उन्होंने साफ कहा कि इस बार टाटा कंपनी का लीज नवीनीकरण नहीं होने दिया जाएगा। चम्पई ने आरोप लगाया कि “टाटा ने हमेशा आदिवासियों से जमीन ली है, लेकिन उनके हितों की कभी रक्षा नहीं की।”
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भूमि अधिकार आंदोलन का बिगुल
अपने करीब दो घंटे के भाषण में चम्पई सोरेन ने घोषणा की कि 22 दिसंबर को भोगनाडीह से भूमि अधिकार आंदोलन की नई शुरुआत की जाएगी। उन्होंने दावा किया कि इस आंदोलन में लगभग पांच लाख आदिवासी शामिल होंगे। चेतावनी देते हुए कहा – “अगर सरकार और कंपनियां हमारे हक की अनदेखी करती रहीं, तो सड़क से लेकर सदन तक संघर्ष होगा।”
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पेसा कानून लागू करने में सरकार नाकाम
सोरेन ने मौजूदा सरकार पर आदिवासी हितों के प्रति गंभीर न होने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने पेसा अधिनियम की समीक्षा की थी और ग्राम सभाओं को आर्थिक रूप से मजबूत करने का प्रयास किया था, लेकिन वर्तमान सरकार इसे लागू नहीं करना चाहती।
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नगड़ी हल जोतने की घटना का जिक्र
उन्होंने नगड़ी हल जोतने की घटना का उल्लेख करते हुए कहा कि सरकार ने इसे रोकने के लिए छावनी बना दी थी, लेकिन आदिवासी समाज ने वहां अपनी जीत दर्ज की। सोरेन ने कहा कि तिलका मांझी, सिदो-कान्हू, बिरसा मुंडा जैसे वीरों ने जल-जंगल-जमीन की लड़ाई लड़ी थी और अब हमें भी उसी परंपरा को आगे बढ़ाना होगा। दान पत्र से जमीन हड़पने का आरोप पूर्व मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि दान पत्र के जरिए सीएनटी-एसपीटी एक्ट को दरकिनार कर जमीनें हड़पी जा रही हैं। उन्होंने कहा कि 22 दिसंबर को भोगनाडीह में होने वाली बैसी (परंपरागत बैठक) में इन जमीनों को वापस लेने का निर्णय लिया जाएगा।
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आरक्षण और शिक्षा पर टिप्पणी
चम्पई सोरेन ने कहा कि उद्योगपतियों ने झारखंड और ओडिशा में हजारों हेक्टेयर जमीन ली, लेकिन आदिवासी समाज को उसका लाभ नहीं मिला। उन्होंने कहा कि जो लोग आदिवासी जीवनशैली छोड़ चुके हैं या धर्मांतरण कर चुके हैं, उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए। साथ ही उन्होंने कहा कि उनके कार्यकाल में स्थानीय भाषाओं में शिक्षा शुरू हुई थी, जिसे बाद की सरकार ने रोक दिया।
निशा उरांव और अन्य बुद्धिजीवियों ने रखे विचार
कार्यक्रम में आईटी विभाग की पूर्व अधिकारी और पंचायती राज की निदेशक रहीं निशा उरांव ने कहा कि हाईकोर्ट ने पेसा कानून तुरंत लागू करने का आदेश दिया है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि जो लोग आदिवासी जीवनशैली छोड़ चुके हैं, वे आदिवासी नहीं माने जाएंगे। इस मौके पर प्रो. ज्योतिंद्र बेसरा, सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता सुभाशीष सोरेन समेत कई बुद्धिजीवियों ने भी अपने विचार रखे।
बिजली गुल होने पर नाराजगी
कार्यक्रम के दौरान दो बार बिजली गुल हो गई। इस पर चम्पई सोरेन ने नाराजगी जताते हुए कहा कि इस तरह के प्रयासों से आदिवासी समाज की आवाज दबाई नहीं जा सकती।

