
जमशेदपुर।
पोटका विधानसभा क्षेत्र के डुमरिया प्रखंड अंतर्गत आस्ता चिंगड़ीया गांव में आदिवासी संथाल समुदाय द्वारा पारंपरिक दिशोम बाहा पर्व श्रद्धा, आस्था और उल्लास के साथ मनाया गया। घाटी बुरू दिशोम जाहेरगाड़ बाहा बोंगा कार्यक्रम में क्षेत्र के विधायक संजेव सरदार शामिल हुए। उन्होंने मारांग बुरु के समक्ष माथा टेककर ग्रामवासियों और क्षेत्रवासियों के सुख, शांति, उत्तम स्वास्थ्य एवं समृद्धि की मंगलकामना की।
प्रकृति पूजा और परंपरा का अद्भुत संगम
दिशोम बाहा पर्व संथाल समाज का प्रमुख प्रकृति पर्व है, जिसे सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक माना जाता है। आस्ता चिंगड़ीया में आयोजित कार्यक्रम के दौरान पारंपरिक वेशभूषा, ढोल-नगाड़ों की गूंज और लोकगीतों के बीच श्रद्धालुओं ने सामूहिक रूप से पूजा-अर्चना की।
मारांग बुरु और जाहेरगाड़ में विधि-विधान के साथ अनुष्ठान संपन्न किए गए। श्रद्धालुओं ने प्रकृति, जल, जंगल और जमीन के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त की। गांव में चारों ओर उत्सव का माहौल रहा और समुदाय की एकजुटता का सुंदर दृश्य देखने को मिला।
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समुदाय की आस्था का उमड़ा सैलाब
पर्व के अवसर पर बड़ी संख्या में ग्रामीण, महिलाएं और युवा पारंपरिक परिधान में शामिल हुए। धार्मिक अनुष्ठान के साथ-साथ सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी आयोजन किया गया, जिसमें लोकनृत्य और पारंपरिक गीतों ने माहौल को भक्तिमय बना दिया।
संथाल समाज में बाहा पर्व को नई फसल और प्रकृति के नवजीवन से जोड़कर देखा जाता है। यह पर्व सामाजिक भाईचारे और सामुदायिक एकता को मजबूत करता है।
संस्कृति हमारी पहचान : विधायक संजीव सरदार
इस अवसर पर विधायक संजीव सरदार ने कहा कि दिशोम बाहा पर्व हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि प्रकृति के प्रति आदर और पूर्वजों की परंपराओं को संजोकर रखना हमारी जिम्मेदारी है।
उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहें और परंपराओं को आने वाली पीढ़ी तक पहुंचाएं। विधायक ने आश्वासन दिया कि क्षेत्र की सांस्कृतिक और सामाजिक परंपराओं के संरक्षण के लिए वे सदैव प्रतिबद्ध रहेंगे।
इनकी रही उपस्थिति
कार्यक्रम में प्रखंड प्रमुख गंगामणी हांसदा, पंचायत मुखिया तपन मुर्मू, झामुमो प्रखंड अध्यक्ष मिर्जा सोरेन, प्रखंड सचिव जयपाल सिंह मुर्मू, झामुमो नेता भगत बास्के, माझी बाबा गण, नायके बाबा सहित कमेटी सदस्य और बड़ी संख्या में ग्रामीण उपस्थित रहे।
दिशोम बाहा पर्व के इस आयोजन ने एक बार फिर यह साबित किया कि आदिवासी संस्कृति और परंपराएं आज भी समाज को एकजुट रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।



