जमशेदपुर: लौहनगरी जमशेदपुर में राजस्थानी संस्कृति और अटूट आस्था का अनूठा संगम देखने को मिला। मारवाड़ी सम्मेलन साकची शाखा द्वारा आयोजित भव्य गणगौर महोत्सव के दौरान मानगो स्थित स्वर्णरेखा नदी का तट “गौरी-ईसर” के जयकारों और राजस्थानी लोकगीतों से गुंजायमान रहा। इस महोत्सव में जमशेदपुर के विभिन्न क्षेत्रों से 3000 से अधिक महिलाएं पारंपरिक राजस्थानी परिधानों में सज-धज कर शामिल हुईं, जिससे पूरा वातावरण मरुधरा की सांस्कृतिक छटा में सराबोर नजर आया।
16 दिनों के कठिन व्रत का हुआ भव्य समापन
मारवाड़ी सम्मेलन साकची शाखा के अध्यक्ष बजरंग लाल अग्रवाल ने पर्व की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए बताया कि गणगौर मारवाड़ी समाज के सबसे प्रमुख और प्राचीन लोक पर्वों में से एक है। चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाने वाला यह त्योहार विशेष रूप से महिलाओं के लिए अखंड सौभाग्य प्राप्ति का पर्व है। होली के दूसरे दिन से शुरू होकर यह पर्व 16 दिनों तक चलता है, जिसका आज विसर्जन के साथ श्रद्धापूर्वक समापन हुआ।
गण और गौर: शिव-पार्वती की उपासना का प्रतीक
अध्यक्ष ने जानकारी दी कि ‘गणगौर’ दो शब्दों के मेल से बना है— ‘गण’ का अर्थ भगवान शिव और ‘गौर’ का अर्थ माता पार्वती से है। यह पर्व वास्तव में शक्ति और भक्ति का संगम है। मान्यता है कि इस दिन कुंवारी कन्याएं सुयोग्य वर की प्राप्ति के लिए और सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और सुख-समृद्धि के लिए व्रत रखती हैं।
पौराणिक महत्व और परंपराएं
इस त्योहार के पीछे एक गहरी पौराणिक कथा छिपी है। कहा जाता है कि कामदेव की पत्नी रति ने भगवान शिव की कठोर तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया था। रति ने शिव के तीसरे नेत्र से भस्म हुए अपने पति कामदेव को पुनः जीवन देने की प्रार्थना की थी। रति की अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान भोलेनाथ ने कामदेव को पुनर्जीवन दिया और उन्हें विष्णु लोक जाने का वरदान दिया। इसी स्मृति में प्रतिवर्ष यह उत्सव हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।
परंपरा के अनुसार, इस पर्व की शुरुआत मिट्टी के बर्तनों (कुंडा) में पवित्र अग्नि की राख इकट्ठा कर उसमें गेहूं और जौ के बीज बोकर की जाती है। सात दिनों के बाद महिलाएं राजस्थानी लोकगीतों के बीच गौरी और ईसर की रंग-बिरंगी मूर्तियां बनाती हैं और पूरे विधि-विधान से पूजा अर्चना करती हैं।
महिलाओं का उत्साह और ‘बयावली’ बेटियों का सम्मान
मारवाड़ी सम्मेलन के महामंत्री बबलू अग्रवाल (मिनी) ने बताया कि विसर्जन समारोह में समाज की महिलाओं ने अपनी-अपनी गणगौर और जंवारा का विसर्जन किया। इस दौरान महिलाओं ने नाच-गाकर और एक-दूसरे को अबीर-गुलाल लगाकर खुशियां बांटीं।
कोषाध्यक्ष सन्नी संघी ने एक महत्वपूर्ण जानकारी साझा करते हुए बताया कि शाखा की ओर से 300 ‘बयावली’ (नवविवाहित) बेटियों एवं बहुओं को विशेष उपहार देकर सम्मानित किया गया। साकची शाखा की ओर से श्रद्धालुओं के लिए शीतल जल, शरबत और चाट-पकौड़ों की भी उत्तम व्यवस्था की गई थी।
आयोजन की सफलता में इनका रहा प्रमुख योगदान
इस विशाल आयोजन को सफल बनाने में मारवाड़ी सम्मेलन साकची शाखा के पदाधिकारियों और सदस्यों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मुख्य रूप से:
पदाधिकारी: अध्यक्ष बजरंग लाल अग्रवाल, महामंत्री बबलू अग्रवाल मिनी, कोषाध्यक्ष सन्नी संघी, और अभिषेक अग्रवाल गोल्डी।
प्रमुख सहयोगी: ओम प्रकाश रिंगसिया, विजय आनंद मुनका, संतोष अग्रवाल, अरुण बाकरेलवाल, लालचंद अग्रवाल, दीपक पारीक, अंशुल रिंगसिया, रमेश मुनका, अशोक गुप्ता, निर्मल पटवारी, दीपक चेतानी, सांवरमल अग्रवाल, सीताराम देबुका, कमल अग्रवाल (कमल फार्मा), पुनीत कावंटिया, राहुल चौधरी, रोहित अग्रवाल, कुशल गनेडिवाल, विकास काउंटिया, और मनोज अग्रवाल सहित हजारों की संख्या में समाज बंधु उपस्थित थे।
यह भव्य महोत्सव न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक रहा, बल्कि इसने जमशेदपुर में मारवाड़ी समाज की एकता और उनकी सांस्कृतिक विरासत को भी मजबूती से प्रदर्शित किया।




