
जमशेदपुर (Jamshedpur): झारखंड सहित पूरे देश में पर्वत शृंखलाओं और नदियों के अस्तित्व पर गहराता संकट अब एक गंभीर चिंता का विषय बन गया है। अविवेकपूर्ण अतिक्रमण, अंधाधुंध खनन और जल संसाधनों के अत्यधिक दोहन के कारण प्राकृतिक धरोहरें विलुप्त होने की कगार पर हैं। इसी गंभीर विषय पर मंथन करने और एक ठोस कानून की रूपरेखा तैयार करने के लिए जमशेदपुर में एक बड़ी और ऐतिहासिक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है।
ठोस कानून के अभाव में अस्तित्व पर मंडरा रहा संकट
वर्तमान वस्तुस्थिति यह है कि देश में पहाड़ों और नदियों के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए कोई स्पष्ट और ठोस कानून मौजूद नहीं है। फिलहाल, वन एवं पर्यावरण के विधिक प्रावधानों से पहाड़ों का, और प्रदूषण नियंत्रण के प्रावधानों से नदियों व जलस्रोतों का नियंत्रण किया जा रहा है। पहाड़ों और नदियों की कोई स्पष्ट वैधानिक परिभाषा और परिभाषित क्षेत्र नहीं होने के कारण इनकी सुरक्षा का कार्य बेहद कठिन हो गया है। हालांकि, संविधान में इस संकट से बचाव का पूरा समाधान निहित है, बस आवश्यकता है तो एक सशक्त अधिनियम की, जिसे भारत सरकार बनाए और सख्ती से लागू करे।
22 और 23 मई को राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन
इसी विषय पर व्यापक विचार-विमर्श करने और समाधान निकालने के लिए आगामी 22 और 23 मई 2026 को जमशेदपुर के ‘मोतीलाल नेहरू पब्लिक स्कूल’ सभागार में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गई है। इस महत्वपूर्ण संगोष्ठी में देशभर से योग्य प्रतिनिधि और पर्यावरण विशेषज्ञ भाग लेंगे और अपने सुझाव रखेंगे। इस पूरे कार्यक्रम का आयोजन देश के प्रख्यात ‘जलपुरुष’ (Waterman) राजेंद्र सिंह और जमशेदपुर पूर्वी के विधायक सरयू राय के संरक्षण और नेतृत्व में किया जा रहा है।
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केंद्र सरकार को सौंपा जाएगा विधेयक का प्रारूप
आयोजकों के अनुसार, इस दो दिवसीय महामंथन का मुख्य उद्देश्य केवल चर्चा करना नहीं है, बल्कि एक ठोस परिणाम निकालना है। संगोष्ठी में गहन विचार-विमर्श के उपरांत पहाड़ों तथा नदियों के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए एक नए विधेयक का प्रारूप (Draft Bill) तैयार किया जाएगा। विशेषज्ञों द्वारा तैयार किए गए इस कानूनी प्रारूप को भारत सरकार को सौंपा जाएगा, ताकि केंद्र सरकार इसे संसद के पटल पर रखकर जल्द से जल्द एक सशक्त अधिनियम (Act) का रूप दे सके।
अब तक इन महानुभावों ने सेमिनार में आने को लेकर सहमति प्रदान की है
न्यायाधीश (रि) गोपाल गावड़ा, डॉ. पीयूष कांत पांडेय (वीसी, अमिटी विश्वविद्यालय, छत्तीसगढ़), प्रो. अंशुमाली (आईआईटी-आईएसएम, धनबाद), सिद्धार्थ त्रिपाठी (आईएफएस), डॉ. राम बूझ (यूनेस्को के पर्यावरण कार्यक्रम के पूर्व निदेशक), दीपक परबतियार (ग्लोबल बिहारी), विभूति देबरामा (त्रिपुरा के यूथ फॉर इंटीग्रेशन के अध्यक्ष), संजय सिंह (बुंदेलखंड), जल जोड़ो अभियान के राष्ट्रीय संयोजक बी. सत्यनारायण (विशाखापत्तनम), संजय उपाध्याय, डॉ. एस.एन. पाठक (पूर्व न्यायमूर्ति), अधिवक्ता एके कश्यप, डॉ. गोपाल शर्मा (जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया)।



