
जिला बार एसोसिएशन की सराहनीय पहल
जमशेदपुर। सिखों के पांचवें गुरु और शहीदों के सरताज गुरु अर्जन देव जी के शहीदी दिवस को समर्पित एक भव्य छबील का आयोजन किया गया। यह आयोजन जिला बार एसोसिएशन के सम्मानित अधिवक्ता गण के तत्वावधान में कोर्ट परिसर के समीप किया गया। इस दौरान आम राहगीरों और जरूरतमंदों के बीच भीषण गर्मी से राहत के लिए ठंडे मीठे शर्बत और चना प्रसाद का वितरण किया गया। इस सेवा कार्य की खास बात यह रही कि माननीय प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश (पीडीजे) सहित अन्य न्यायिक पदाधिकारीगण ने भी छबील पर पहुंचकर प्रसाद ग्रहण किया और सेवा भावना की सराहना की।

READ MORE..JAMSHEDPUR NEWS: जमशेदपुर में अवैध शराब के खिलाफ बड़ी कार्रवाई, भारी मात्रा में विदेशी बियर बरामद, एक गिरफ्तार
सामाजिक सद्भावना और सेवा की अनूठी मिसाल
गुरु महाराज के प्रति नतमस्तक होने और सिख समुदाय के साथ सामाजिक सद्भावना प्रकट करने के लिए बार एसोसिएशन के कई दिग्गज चेहरों ने इस छबील में बढ़-चढ़कर अपनी सेवा दी। सेवा कार्य में मुख्य रूप से अमरजीत कौर विश्वास, मलकीत सिंह सैनी, सुधीर कुमार पप्पू, राजीव सिंह सैनी, जगदीप सिंह गोल्डी, नरेंद्र सिंह, अभय सिंह, नंदकिशोर, लूसी, शर्ऐया, सोमा, कावेरी, बबिता जैन, मनप्रीत सिंह सैनी, सरदार शैलेंद्र सिंह, हरविंदर सिंह मंटू, अजीत सिंह गंभीर और उत्तर प्रदेश संघ के अध्यक्ष अखिलेश दुबे सहित भारी संख्या में अन्य अधिवक्ता गण मौजूद रहे। छबील की शुरुआत से पहले बाबा जी ने समस्त जीवों के कल्याण और विश्व शांति के लिए अरदास की।
गुरु अर्जन देव जी की शहादत का ऐतिहासिक महत्व
उल्लेखनीय है कि सिख इतिहास में गुरु अर्जन देव जी की शहादत का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। मुगल बादशाह जहांगीर के आदेश पर लाहौर में मंगोलों के ‘यशा’ कानून के अनुसार गुरु महाराज को अमानवीय यातनाएं देकर शहीद किया गया था। उन्हें धधकते हुए गर्म लोहे के तवे पर बैठाया गया और उनके शीश व शरीर पर तपती हुई रेत डाली गई। इसके बाद उन्हें खौलते हुए पानी के बड़े बर्तन (देग) में डाला गया था। इन क्रूर यातनाओं के कारण उनका पूरा शरीर काला पड़ गया था और रक्त सूख गया था। अंत में उनके पार्थिव देह को रावी नदी के ठंडे जल में प्रवाहित कर दिया गया था।
READ MORE..JAMSHEDPUR NEWS: भीषण गर्मी में टाटानगर स्टेशन पर उमड़ा जनसैलाब, गुरु अर्जुन देव जी के शहीदी दिहाड़े पर बंटा छबील और कड़ाह प्रसाद
छबील और शर्बत वितरण की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
इस ऐतिहासिक प्रसंग के पीछे एक बेहद भावुक कथा जुड़ी है। गुरु जी को गिरफ्तार कराने वाले मंगू ब्राह्मण की बहू ने जब अपनी भूल का प्रायश्चित करना चाहा, तो वह चुपके से जेल में गुरु जी के लिए ठंडा शर्बत लेकर पहुंची थी। गुरु जी ने उस समय तो शर्बत को अस्वीकार कर दिया था, परंतु उन्होंने उसकी श्रद्धा और समर्पण को देखते हुए वचन दिया था कि आने वाले दिनों में तुम्हारे इस समर्पण की याद में यह शर्बत हमेशा के लिए अजर-अमर रहेगा। इसी ऐतिहासिक परंपरा और गुरु जी के सर्वोच्च बलिदान को याद करते हुए हर साल ज्येष्ठ मास की तपती गर्मी में छबील लगाकर शर्बत बांटने की परंपरा निभाई जाती है।



