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Home » Jamshedpur Literature Festival : संघर्ष से शिखर तक: पद्मश्री गुलाबो सपेरा की प्रेरणादायक जीवन गाथा ,कालबेलिया नृत्य को दिलाई वैश्विक पहचान
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Jamshedpur Literature Festival : संघर्ष से शिखर तक: पद्मश्री गुलाबो सपेरा की प्रेरणादायक जीवन गाथा ,कालबेलिया नृत्य को दिलाई वैश्विक पहचान

Sponsored By: ANNI AMRITADecember 21, 2025No Comments5 Mins Read
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ANNI AMRITA 

जमशेदपुर.

कालबेलिया नृत्य को विश्व मंच तक पहुंचाने वाली पद्मश्री सम्मानित लोकनृत्य कलाकार गुलाबो सपेरा का जीवन संघर्ष, साहस और परंपरा को नई पहचान देने की असाधारण कहानी है. एक ऐसे समाज में जन्मी गुलाबो, जहां बेटियों को नाचने की अनुमति नहीं थी, उन्होंने न केवल रूढ़ियों को तोड़ा बल्कि कालबेलिया नृत्य को वैश्विक पहचान दिलाई. जमशेदपुर लिटरेचर फेस्टिवल में भाग लेने पहुंची पद्मश्री गुलाबो सपेरा से बिहार झारखंड न्यूज नेटवर्क के लिए अन्नी अमृता ने खास बातचीत की.

बातचीत में गुलाबो सपेरा ने जो अपनी संघर्ष यात्रा बताई, उसे सुनकर किसी के भी आंखों में पानी आ जाएगा. गुलाबो सपेरा का जन्म जयपुर के पास कालबेलिया समाज में हुआ. बचपन से ही उनका जीवन संघर्षों से घिरा रहा. दो साल की उम्र से ही वे संपेरा परंपरा से जुड़ गईं. उनके पिता सांपों को बचाने का काम करते थे. समाज की कुरीतियों के चलते गुलाबो को नवजात अवस्था में जमीन में गाड़ दिया गया था, लेकिन मां और मौसी की जद्दोजहद से पांच घंटे बाद उनकी जान बचाई जा सकी. यह उनका पहला जीवनदान था.

समाज के डर और जुर्माने के कारण पिता उन्हें अपने साथ रखने लगे ताकि कोई उन्हें नुकसान न पहुंचा सके. सांपों के बच्चों को दूध पिलाने और उनके साथ रहते-रहते गुलाबो ने सांपों की चाल और लय को देखा, समझा और वहीं से नृत्य की प्रेरणा मिली. समाज की बंदिशों के कारण वे घर और जंगल में छुपकर नाचती थीं. उस समय बेटियों का नृत्य करना स्वीकार्य नहीं था और कालबेलिया नृत्य केवल पुरुषों द्वारा, महिला वेश में किया जाता था.

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पहला मंच और सामाजिक बहिष्कार

साल 1981 में महज सात वर्ष की उम्र में पुष्कर मेले में गुलाबो को पहली बार मंच मिला. यह उनके जीवन का निर्णायक मोड़ था. इसके बाद समाज ने उन्हें बाहर कर दिया, लेकिन राजस्थान पर्यटन विभाग ने उनका साथ दिया. आगे चलकर उन्हें अमेरिका सहित कई देशों में प्रस्तुति देने का अवसर मिला. महारानी गायत्री देवी और पर्यटन विभाग के संरक्षण ने उनके करियर को नई दिशा दी.

अपनी कला के प्रदर्शन के लिए जब गुलाबो अमेरिका गईं और वापस लौटीं तब समाज के लोग दिल्ली आकर उन्हें समाज में वापस लाने का आग्रह करने लगे. गुलाबो ने समाज की गलत परंपराओं को स्वीकार करने से इनकार कर दिया. इसके बावजूद उन्हें समाज का सरपंच चुना गया, शर्त यह थी कि बेटियों की हत्या जैसी कुप्रथाएं बंद हों. इसके बाद कालबेलिया समाज में बेटियों को मारने की प्रथा पर रोक लगी.

नई पीढ़ी के लिए रास्ता

गुलाबो सपेरा की 14 वर्ष की उम्र में ही शादी हो गई, लेकिन उन्होंने नृत्य नहीं छोड़ा. उन्होंने अपनी बेटियों को पढ़ाया, जो उस समय के समाज में एक क्रांतिकारी कदम था. उनकी बेटी राखी पूनम सपेरा पढ़-लिखकर फ्रांस गईं, फिल्मों में काम किया और कालबेलिया नृत्य को अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रस्तुत किया. बिहार झारखंड न्यूज नेटवर्क को गुलाबो ने बताया कि उनकी बड़ी बेटी उनके समाज की पहली बेटी बनी जिसने शिक्षा ग्रहण की.

पद्मश्री और कलाकारों की पीड़ा

साल 2016 में गुलाबो सपेरा को भारत सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित किया. लेकिन वे मानती हैं कि कलाकारों की कद्र अक्सर केवल मंच तक सीमित रहती है. “नृत्य की एक उम्र होती है, उसके बाद कलाकार का क्या?” वे सवाल उठाती हैं. गुलाबो चाहती हैं कि सरकार कलाकारों के लिए जमीन, घर, इलाज और सामाजिक सुरक्षा जैसी सुविधाएं सुनिश्चित करे. वे कहती हैं कि विदेशों में कलाकारों को “भारत की बेटियां” कहा जाता है, लेकिन अपने देश में उनके बुढ़ापे की कोई व्यवस्था नहीं.

परंपरा और आस्था

गुलाबो सपेरा कालबेलिया जाति के नाथ संप्रदाय से हैं. परंपरा के अनुसार वे शव को जमीन में दफनाते हैं, लेकिन राजस्थान में यह समुदाय जमीन की कमी से जूझ रहा है. इस मुद्दे को लेकर गुलाबो लगातार आवाज उठा रही हैं.

बिहार झारखंड न्यूज नेटवर्क से बातचीत में गुलाबो ने बताया कि वे चामुंडा माता की भक्त हैं. जयपुर के जंगल में स्थित समाज के मंदिर से उनकी गहरी आस्था जुड़ी है. उन्होंने ही यह मंदिर बनवाया है. उन्होंने अपनी पारंपरिक वेशभूषा खुद डिजाइन की और सांपों के साथ नृत्य कर कालबेलिया नृत्य को नई पहचान दी.

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कालबेलिया घराना और भविष्य
आज पुष्कर में कालबेलिया स्कूल बन चुका है और यह नृत्य एक स्थापित घराना बन गया है. गुलाबो मानती हैं कि अब समाज आगे बढ़ रहा है और हर घर में “गुलाबो” जैसी बेटियां हों, यही उनकी प्रेरणा है.
गुलाबो सपेरा का जीवन इस बात का प्रमाण है कि “मारने वाला भी ऊपरवाला और बचाने वाला भी ऊपरवाला है”, लेकिन संघर्ष, साहस और आत्मविश्वास इंसान को इतिहास रचने की ताकत देते हैं. उनकी कहानी न सिर्फ कालबेलिया समाज बल्कि पूरे देश की बेटियों के लिए प्रेरणा है.

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BJNN Desk
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आनंद किशोर बिहार झारखंड न्यूज़ नेटवर्क में कॉपी एडिटर के रूप में कार्यरत हैं। वे सामाजिक मुद्दों, जनहित और मानवीय संवेदनाओं से जुड़ी खबरों पर विशेष रुचि रखते हैं। आनंद का उद्देश्य कमजोर और जरूरतमंद लोगों की आवाज को सही मंच तक पहुंचाना है। वे निष्पक्ष, सरल और प्रभावशाली पत्रकारिता में विश्वास रखते हैं।

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