
चाईबासा: विश्व आदिवासी दिवस (World Tribal Day 2026) की पूर्व संध्या पर शनिवार, 8 अगस्त को चाईबासा स्थित कोल्हान विश्वविद्यालय (Kolhan University) के वीर शहीद पोटो हो सभागार में एक भव्य और विचारोत्तेजक समारोह का आयोजन किया गया। विश्वविद्यालय के मानवशास्त्र, इतिहास, भूगर्भ और भूगोल विभाग के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम में देश के जाने-माने अर्थशास्त्री डॉ. ज्यां द्रेज़ (Jean Drèze) और पद्मश्री डॉ. जानुम सिंह सोय सहित कई दिग्गज शामिल हुए। कुलपति प्रो. (डॉ.) अंजिला गुप्ता की अध्यक्षता में हुए इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य आदिवासी समुदायों के अधिकार, गरिमा, भाषा, संस्कृति और उनके पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण को अकादमिक और सामाजिक विमर्श से जोड़ना था।


‘आदिवासी समाज में ऊंच-नीच की भावना नहीं’- डॉ. ज्यां द्रेज़
सम्मानित अतिथि के रूप में उपस्थित प्रख्यात अर्थशास्त्री और सामाजिक चिंतक डॉ. ज्यां द्रेज़ ने आदिवासी समाज की सामाजिक संरचना पर अपने बेबाक विचार रखे। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज में अनावश्यक सामाजिक पदानुक्रम या ऊंच-नीच की भावना नहीं होती है। उनका सामुदायिक जीवन, साझी संस्कृति और सामूहिक मूल्य आज भी पूरे समाज के लिए एक बड़ी प्रेरणा हैं। वहीं, साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित विशिष्ट अतिथि श्री भोगला सोरेन ने वैश्वीकरण (Globalization) के दौर में आदिवासी भाषा और संस्कृति पर पड़ रहे नकारात्मक प्रभावों पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए इसके संरक्षण पर विशेष बल दिया।
हो भाषा में पद्मश्री डॉ. जानुम सिंह सोय का संदेश
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि पद्मश्री डॉ. जानुम सिंह सोय ने हो (Ho) भाषा में अपना वक्तव्य देकर उपस्थित युवाओं में नई ऊर्जा भर दी। उन्होंने युवाओं से अपनी मातृभाषा, संस्कृति और परंपराओं से मजबूती से जुड़े रहने का आह्वान किया। हो गीत के माध्यम से उन्होंने अपनी सांस्कृतिक जड़ों को न भूलने का जो संदेश दिया, उसने पूरे सभागार को भावविभोर कर दिया। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहीं कुलपति प्रो. (डॉ.) अंजिला गुप्ता ने कहा कि कोल्हान विश्वविद्यालय आदिवासी समाज की इस समृद्ध ज्ञान परंपरा को शिक्षा और शोध से जोड़ने के लिए निरंतर प्रयासरत है ताकि युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों से परिचित कराया जा सके।
‘सुकुन बुरु’ और चित्रकला प्रदर्शनी ने मोहा मन
समारोह के दौरान आयोजित चित्रकला और आदिवासी कला-संस्कृति प्रदर्शनी ने अतिथियों का खूब ध्यान खींचा। गैलरी में श्री अनुपम पूर्ति, डॉ. अभिजीत मुंडा, श्री हरे कृष्णा और श्री रवि मुंडू की कलाकृतियों ने आदिवासी जीवन और प्रकृति के संबंधों को बेहद प्रभावशाली ढंग से दर्शाया। श्री अनुपम पूर्ति की विशेष ‘सुकुन बुरु’ (Sukun Buru) प्रस्तुति ने यह साबित किया कि आदिवासियों के लिए प्रकृति सिर्फ एक संसाधन नहीं है, बल्कि यह उनके अस्तित्व और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है। कार्यक्रम के सफल आयोजन में संयोजक डॉ. मीनाक्षी मुंडा, सह-संयोजक डॉ. अरविंद कुमार और कुलसचिव डॉ. अमर कुमार का विशेष योगदान रहा। धन्यवाद ज्ञापन श्रीमती रिंकी दोराई ने किया।




