
जमशेदपुर,
आनन्द मार्ग प्रचारक संघ के तत्वावधान में, आनंद मार्ग प्राइमरी स्कूल व आनंद मार्ग जागृति कांड्रा रविवार को त्रिदिवसीय सेमिनार के अंतिम दिन सेमिनार में उपस्थित साधक साधिकाओं को संबोधित करते हुए केन्द्रीय प्रशिक्षक आचार्य संपूर्णानंद अवधूत ने कहा कि धर्म मानव जीवन की एक मूल्यवान संपदा है। धर्म मनुष्य को मुकुट मणि के रूप में प्रतिष्ठित करता है। धर्म के बिना सृष्टि के मर्म को समझना दुरूह कार्य है। धर्म भाव में प्रतिष्ठित करना धर्मशास्त्र का उद्देश्य है। मनुष्य की अंतः स्थल में प्रसुप्त धर्म बोध को सहज तौर पर जगाने के लिए आध्यात्मिक साधना करना अत्यावश्यक है। आहार, निद्रा, भय, मैथुन यह जैव धर्म है। भागवत धर्म (मानव धर्म)का तात्पर्य है धृति, क्षमा, दमो, अस्तेय, शौच, इंद्रिय निग्रह, धी, विद्या, सत्य और अक्रोध जैसे लक्षणों को जागृत करना। आचार्य जी ने कहा कि धर्मशास्त्र को गंभीर सत्य में प्रतिष्ठित होना होगा। धर्म भाव में प्रतिष्ठित करना ही धर्म शास्त्र का उद्देश्य है। *भक्त भेदभाव की भाव



