
आज की दुनिया और बढ़ता मानसिक विकार–सामान्य-असामान्य लक्षमों की पहचान–समाधान



अजिताभ गौतम
क्लीनिकल साईकोलॉजिस्ट
मनुष्य ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में काफी अधिक प्रगति कर चुका है। चाँद -सितारों तक तो पहुँच ही रहा है,तकनीकी क्षेत्र में भी सफलता प्राप्त कर रहा है।भौतिक,वैज्ञानिक व व्यावहारिक विकास की यात्रा गति के साथ जारी है। परंतु साथ- साथ एक और भी पक्ष हमारे सामने है। पहले की तुलना में आज हम तनाव,चिंता,प्रतिबल, असंतोष,कुसुमायोजन, अन्य मानसिक विकारों एवं समस्याओं से बहुत अधिक प्रभावित हैं। भौतिक सुख-सुविधा में अत्यधिक वृद्धि के बावजूद आज का आदमी स्वयं में प्रायः संतुष्ट कम है। वह प्राकृतिक आपदाओं या शारीरिक बीमारियों से उतना पीड़ित नही है जितना कि मानसिक विकारों से पीड़ित है।
इस प्रसंग में जेसी कॉलेमन कथन अत्यधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है। “सत्रहवीं शताब्दी ज्ञान का युग रही है,अट्ठारहवीं शताब्दी तर्क का युग,उन्नीसवीं शताब्दी प्रगति का युग और बीसवीं शताब्दी चिंता का युग है।”
मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से आने वाला समय और भी चुनौतीपूर्ण होगा। आकांक्षाए बढ़ती जा रही हैं, पूर्ति के लिए भाग-दौड़ भी बढ़ती जा रही है, उपलब्धि के अवसर जनसंख्या वृद्धि की दृष्टि से घट रहे हैं, प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है और आदमी मूल्यों के द्वंद में उलझता जा रहा है। व्यावयरिक समायोजन की समस्या आज हमारे सामने विकराल रूप से खड़ी है। व्यक्ति विभिन्न प्रकार की मानसिक बीमारियों से ग्रस्त होता जा रहा है।
तनावों से राहत पाने के लिए लोग मद्यपान(for example) करना शुरू करते हैं, पर ये उचित और स्थायी समाधान नही है,ये हम जानते हैं….समस्याओं से मुक्ति में सहायक है व्यसायिक मदद ,जो साईको शिरप प्रदान करता है.
असामान्य व्यवहार का अध्यन,मूल्यांकन,उपचार एवं निवारण
मन की गांठें खोलकर और परतें हटाकर काउंसलिंग के माध्यम से तनाव कम किया जा सकता है. मनोविकृति विज्ञान की मान्यता है कि “रोकथाम उत्तम उपचार है”। आजकल ऐसे उपायों की खोज पर बल: बहुत से लोग मानसिक रोगों को दुराव की दृष्टि से देखते हैं जबकि इसे भी शारीरिक रोगों की ही भांति लिया जाना चाहिए। प्रोफेशनल से से परामर्श करना चाहिए। उचित सलाह और व्यवसायिक मदद ज़रूरी है
आज असामान्य व्यवहार को असाध्य नहीं बल्कि साध्य माना जाता है। इसके लिए क्लाईंट को व्यवसायिक सहायता ,परामर्श,उपचार एवं सहानुभूति की आवयश्कता है।
असामान्य व्यवहार ऐसा कुसुमायोजी व्यवहार है जो व्यक्ति एवं/या समूह के लिए हानिकारक होता है….वास्तविक जीवन में सामान्यता एवं असामान्यता के बीच स्पस्ट विभाजक रेखा खींचना बहुत कठिन है।फिर भी वायना विएटन के अनुसार—“यदि लोगों का व्यवहार अत्यधिक विचलित,कुसुमायोजी या व्यथा(कष्ट) युक्त हो जाता है तो उन्हें मानसिक विकारों से प्रभावित माना जाएगा।”
समायोजन,मानसिक संतुलन,संगत व्यवहार,सुरक्षा की भावना,व्यक्तिव में संगठन,सूझ,आत्म सम्मान,वास्तिविक उद्देश्य, सांवेगिक स्थिरता(emotional stability and balance), आत्मज्ञान,पूर्वानुभव से लाभ उठाने की योग्यता…….ये सब का शिरप है साईको शिरप
सामान्य एवं असामान्य व्यवहार में अंतर गुणात्मक या मात्रात्मक प्रकार का हो सकता है। दोनों में अंतर मात्रात्मक अधिक ही होता है। जैसे असामान्य व्यक्ति में कुसुमायोजन की समस्या अधिक और सामान्य व्यक्ति में कम होगी या नहीं भी हो सकती है। सामान्यतः एक निश्चित सीमा के ऊपर असामान्यता पहुँचने पर हमारे लिए चिंता का विषय बनती है(
असामान्य एवं सामान्य व्यक्तियों में अन्तर स्थापित करने के कुछ महत्वपूर्ण आधार——-
–1) समायोजन: सामान्य व्यक्ति जीवन की विभिन्न परिस्थितियों में समायोजन स्थापित करने में सफल रहता है। यदि कोई समस्या या व्यवधान उत्पन्न भी हो जाता है,तो वह उससे घबराता नहीं है। उसका सामना करता है। उसे चुनौती(challenges) के रूप में लेता है। व्यवहार को गतिशील एवं पुनर्संगठित करके उसे परिस्थिति के अनुकूल बनाता है। परिस्थिति की वास्तविकता को समझकर व्यवहार करता है ताकि चिंता एवं कुंठा से बच सके। इस योग्यता एवं कौशल से परिचित करवाता है—साईको शिरप
वास्तिवकता के प्रति उन्नमुखता–orientation to reality–असामान्य व्यक्ति जीवन की विभिन्न परिस्थितियों का उचित रूप में मूल्यांकन एवं विश्लेषण नहीं कर पाता। इसलिए उसका परिस्तिथि की वास्तिविकता से संबंध टूट जाता है। उसमें विकृत(जो प्रकृति नही हो)सोच बढ़ जाती है,यथार्थ को अस्वीकार करने लगता है। सामान्य व्यक्ति वास्तविक दृश्टिकोण के साथ कार्य करता है। साईको शिरप वास्तिविकता से नाता जोड़ता है।
: 3)सूझ–insight–disturbed mind में सूझ,विवेक एवं रचनात्मक चिंतन की कमी पाई जाती है।psycho syrup उचित-अनुचित,संगत-असंगत में अंतर साफ करवाता है,ताकि निर्णय लेने की क्षमता विकसित हो और तनाव,कुंठा व अवसाद की तीव्रता न बढ़े और सफल समायोजन हो।असफल होने पर psycho syrup पुनरचिन्तन करने में help करता है syrup।बेहतर समाधान खोजने में सहायक होता है psycho syrup
4) कौशल एवं संगति–psycho syrup ,व्यवहार में संवेगात्मक स्थिरता और कुशलता लाने में मदद करता है।
5)आत्म-चिंता—-self care —psycho syrup स्वयं की समुचित देखभाल सिखाता है ताकी आत्म-सम्मान(self esteem) कायम रहे और कोई नुकसान न हो जिससे मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।
: 6) सुरक्षा-security–psycho syrup अनावश्यक असुरक्षा की भावना से स्वयं को बचाए रखने का हुनर सिखाता है ताकि दिमाग चिंता एवं भय को हावी न होने दे।
Psycho syrup आपके health को विकसित करता है।
Psycho syrup आपके मन के गांठों को खोल कर आपके ‘समायोजन’ को विकसित करता है!

