जमशेदपुर।
दोलमा (दलमा) राजा राकेश हेम्ब्रम ने गदड़ा स्थित अपने आवास पर 12 मौजा के ग्रामीणों संग बैठक कर इस बाबत निर्णय लिया। आह्वान किया कि 16 मई, सोमवार को कोल्हान समेत पूरे झारखंड, बंगाल व ओडिशा के आदिवासी सेंदरा पर्व पर पूजा अर्चना करने के लिए पहुंचें और अपनी पौराणिक परंपरा को जीवित रखने में अपनी भूमिका सुनिश्चित करें। दोलमा राजा राकेश हेम्ब्रम ने कहा कि हम हमारी सेंदरा की परंपरा को हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी पूरी करेंगे। इसमें आने वाली अड़चनों से हमें लड़ना होगा और अपनी सांस्कृतिक पहचान को कायम रखना होगा। दोलमा राजा ने सेंदरा के लिए गांव-गांव गिरा साकाम (न्यौता) भेज दिया है।सेंदरा का मतलब सिर्फ शिकार नहीं : राकेश
दोलमा राजा राकेश हेम्ब्रम ने कहा कि सेंदरा पर्व का मतलब सिर्फ जंगली जानवरों का शिकार करना मानना बड़ी भूल है। यह आदिवासियों की एक पारंपरिक पर्व है जिसमें समाज के लोग परंपरा के मुताबिक दलमा की चोटी पर पहुंच अपने इष्टदेवों की पूजा-अर्चना करते हैं। इसका कतई यह मतलब नहीं कि इस पर्व में जीव हत्या की ही जाएगी। दोलमा राजा ने कहा कि इस पूजा में पारंपरिक हथियारों के साथ शामिल होना अनिवार्य है, इसलिए हम इस पर्व पर हथियारों से लैस होकर न सिर्फ गदड़ा गांव में बल्कि दलमा पहाड़ की चोटी पर भी पूजा करते हैं। इसलिए हमारी परंपरा पर प्रशासन, शासन या सरकार की चोट को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
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सेंदरा की परंपरा : मांगते अच्छी वर्षा का वरदान
वैसे तो आम मान्यता है कि आदिवासी समाज सेंदरा पर्व के दिन दलमा पहाड़ पर जंगली जानवरों का शिकार करता है, लेकिन दोलमा राजा इससे इन्कार करते हैं। वे कहते हैं यह परंपरा है जिसका हम निर्वाहन करते हैं। इस सेंदरा पर्व पर हम पहाड़ी देवी-देवताओं से दलमा की चोटी पर पहुंच अच्छी वर्षा होने का वरदान मांगने के लिए उनकी पूजा करते हैं। बताते चलें कि इस दिन आदिवासी समाज के लोग पारंपरिक हथियार (तीर-धनुष) लेकर ढोल-नगाड़ा बजाते हुए दलमा की तलहटी (फदलोगोड़ा) में पूजा करने के बाद जंगल चढ़ते हैं और चोटी पर पहुंच पूजा करते हैं। इस क्रम में पिछले कुछ वर्षो में कुछ जानवरों का शिकार भी किया गया, लेकिन दोलमा बुरु सेंदरा समिति ने हमेशा किसी जानवर का शिकार करने की पुष्टि नहीं की है। बहरहाल इस दिन दलमा की तलहटी पर आदिवासियों का मेला सा लगता है।आदिवासी समाज के लोग सेंदरा को जीव हत्या का पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति को समर्पित इको-फ्रेंडली पर्व मानते हैं। इस पर्व पर आदिवासी समाज के लोग जंगल में एक तरफ से ढोल-नगाड़े बजाते हुए जंगल में चढ़ते हैं। इससे जंगल में इधर-उधर भटके जानवर दूसरी तरफ भागने लगते हैं और इतने बड़े जंगल में पूरे वर्ष भटके जानवरों को फिर से मिलन का मौका मिलता है। इससे प्रजनन की प्रक्रिया आगे बढ़ती है।
दोलमा बुरु सेंदरा समिति ने वन विभाग को सेंदरा पर्व के मद्देनजर ताकीद की कि है कि वह जगह-जगह चेक नाका बनाकर सेंदरा को दलमा आने वाले आदिवासियों से उनके पारंपरिक हथियार न छीने और न ही जब्त करे। इस बार ऐसा करने की स्थिति में उन चेकनाकों पर आदिवासी समाज के लोगों का जुटान होगा और उग्र विरोध दर्ज किया जाएगा। सेंदरा समिति ने वन विभाग से परंपरा का निर्वाह करने में मदद मांगी है।
सेंदरा समिति ने बंगाल की तर्ज पर झारखंड में एक दिन के आदिवासियों के सेंदरा पर्व को कानूनी मान्यता दिलाने की मांग की है। बैठक को संबोधित करते हुए भुगलु सोरेन ने कहा कि बंगाल में आजोदिया जंगल में सेंदरा के लिए आदिवासियों के लिए इस तरह का प्रावधान है, झारखंड में भी ऐसा ही हो।




