जमशेदपुर।
परसुडीह में भागवत कथा का चैथा दिन जमशेदपुर। परसुडीह सोसाइटी काॅलोनी स्थित श्री शिव दुर्गा हनुमान मंदिर में चल रहे भागवत कथा सप्ताह के चैथे दिन शनिवार को भगवान शिव और माता सती की महिमा का गुणगान करते हुए कथावाचक आचार्य प्रसन्न कुमार शास्त्री ने कहा कि माता सती ने अपने पिता महाराज दक्ष के द्वारा भगवान शिव को अपमानित करने पर अग्नि में अपने आप को भस्म कर दिया।
भगवान शिव का दो अक्षरों का नाम बातचीत के प्रसंग में अनायास जिह्वा पर आ जाने पर भी नाम लेने वाले के समस्त पापों का विनाश प्रभु कर देते है। शास्त्री जी भावनात्मक शैली से कथा का भक्तों को रसपान कराते हुए आगे कहा कि भागवत कथा सुनने से मनुष्य के विचारों को समाजोपयोगी दिशा मिलती है। भगवान शिव की अनुमति लिए बिना माता अपने पिता दक्ष के यज्ञ में भाग लेने पहुंच गईं। यज्ञ कार्यक्रम में भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया गया था। भगवान के मना करने के बाद भी सती नहीं मानी और पीहर चली गई थी। पीहर में सती का अपमान हुआ। इससे सीख मिलती है कि जो नारी अपने पति की आज्ञा की अव्हेलना करती है। उसे संसार में अपमानित होना पड़ता है। सती की कथा सुनकर भक्त भावुक हुए। कथावाचक ने आगे कहा कि भगवान का नाम लेगा और कथा करेगा तो वह भाव सागर से पार हो जायेगा। भगवान को जब-जब भक्त प्रेम से पुकारते हैं भगवान दौड़े चले आते हैं। संसार के संसाधनों एवं खाघ पदार्थो से जो मिलता है, वह सुख हैं, आनन्द नहीं। आनन्द तो केवल ईश्वर के कथा, नाम एवं लीला में हैं। सुख का उल्टा दुःख हो सकता हैं पर आनन्द का उल्टा आज तक नहीं मिला। अर्थात आनन्द ही ईश्वर हैं।
भगवान शिव का दो अक्षरों का नाम बातचीत के प्रसंग में अनायास जिह्वा पर आ जाने पर भी नाम लेने वाले के समस्त पापों का विनाश प्रभु कर देते है। शास्त्री जी भावनात्मक शैली से कथा का भक्तों को रसपान कराते हुए आगे कहा कि भागवत कथा सुनने से मनुष्य के विचारों को समाजोपयोगी दिशा मिलती है। भगवान शिव की अनुमति लिए बिना माता अपने पिता दक्ष के यज्ञ में भाग लेने पहुंच गईं। यज्ञ कार्यक्रम में भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया गया था। भगवान के मना करने के बाद भी सती नहीं मानी और पीहर चली गई थी। पीहर में सती का अपमान हुआ। इससे सीख मिलती है कि जो नारी अपने पति की आज्ञा की अव्हेलना करती है। उसे संसार में अपमानित होना पड़ता है। सती की कथा सुनकर भक्त भावुक हुए। कथावाचक ने आगे कहा कि भगवान का नाम लेगा और कथा करेगा तो वह भाव सागर से पार हो जायेगा। भगवान को जब-जब भक्त प्रेम से पुकारते हैं भगवान दौड़े चले आते हैं। संसार के संसाधनों एवं खाघ पदार्थो से जो मिलता है, वह सुख हैं, आनन्द नहीं। आनन्द तो केवल ईश्वर के कथा, नाम एवं लीला में हैं। सुख का उल्टा दुःख हो सकता हैं पर आनन्द का उल्टा आज तक नहीं मिला। अर्थात आनन्द ही ईश्वर हैं।


