रांची-झारखंड की राजनीति में अर्जुन मुंडा के बुरे दिन

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-मुख्यमंत्री रघुवर दास और अर्जुन मुंडा में है छत्तीस का रिश्ता
-रघुवर के निशाने पर सरयू राय और निशिकांत दूबे भी
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कुमार प्रदीप
खबर विशेष – खंड-खंड राजनीति।
बिहार-झारखंड की राजनीतिक हलचल सिर्फ बिहार-झारखंड न्यूज नेटवर्क पर
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यह समय का फेर है या राजनीति की तल्ख हकीकत, सत्ता में रहने वाला संगठन पर अकसर हावी रहता है। कुछ ऐसा ही देखने को मिल रहा है झारखंड प्रदेश भाजपा में। प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने के बाद बोरियो के विधायक ताला मरांडी ने भी समय की धार को देखकर पाला बदलना शुरू कर दिया है। ताला मरांडी को अर्जुन मुंडा का करीबी माना जाता रहा है लेकिन जिस प्रकार उन्होंने दुमका में आयोजित प्रदेश भाजपा की कार्यसमिति बैठक में अर्जुन मुंडा को पुर्जा भेजकर बोलने से मना किया उससे प्रतीत हो रहा है कि मुंडा के पास अब ताला की चाबी नहीं रही। उनका सिक्का खोटा निकल गया। दरअसल ताला को प्रदेश अध्यक्ष बनाने को रघुवर दास तैयार नहीं थे लेकिन पार्टी आलाकमान ने लगभग इस अनाम से ट्राइबल नेता को थोप दिया। आरंभ में रघुवर दास थोड़े विचलित थे लेकिन उन्होंने ताला की चाबी खोजनी शुरू की। अपने कुछ विश्वस्तों को साथ लगाया तो ताला मरांडी उनके खांचे में फिट बैठ गए। यही वजह है कि अब आने वाले दिनों में ताला मरांडी अपनी करामात दिखाएंगे, जिसमें पीछे से भूमिका रघुवर दास की होगी।
झारखंड प्रदेश भाजपा की नई कार्यसमिति से अर्जुन मुंडा के समर्थक इस बार दूर हीं रहेंगे। मंत्री सरयू राय के करीबियों का भी कुछ यही हश्र हो सकता है। राय भी रघुवर के समानांतर चल रहे हैं। वे अकसर कैबिनेट की बैठक में नहीं दिखते। व्यवहार भी विपक्ष सरीखा होता है। भाजपा की प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में रघुवर दास ने इशारों हीं इशारों में कहा-अपने कुछ साथी सार्वजनिक मंच पर अपनी बात रखते हैं तो ऐसा प्रतीत हो रहा है कि वे विपक्ष की भाषा बोल रहे हैं। यह गलत है और पार्टी के वरिष्ठ नेता इसे गंभीरता से ले रहे हैं।
जाहिर है रघुवर का इशारा मुंडा और राय की और था। यह भी बताते हैं कि रघुवर निशिकांत दूबे से भी नाराज चल रहे हैं। संताल परगना की राजनीति में कद्दावर दूबे की आलाकमान में गहरी पैठ है। यही वजह है कि रघुवर दास ने वैसे अपने तमाम विरोधियों को निपटाना शुरू कर दिया है जिनसे उन्हें आने वाले दिनों में खतरा है। रघुवर की हिट लिस्ट भी तैयार है। वे अपने करीबियों को मजबूत कर रहे हैं। महेश पोद्दार को राज्यसभा भेजकर उन्होंने इसे सिद्ध किया है। वहीं विरोधियों को दबाने का कोई मौका वे नहीं चूक रहे
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