
प्रदीप गुप्ता,


नई दिल्ली : देश की आर्थिक और रणनीतिक सुरक्षा अब खदानों से निकलने वाले खनिजों की निर्बाध घरेलू आपूर्ति से सीधे जुड़ गई है। संसद द्वारा पारित माइंस एंड मिनरल्स (डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन) यानी एमएमडीआर संशोधन कानून 2026 ने देश की खनिज नीति को एकसमान और पारदर्शी बनाने की बड़ी पहल की है, लेकिन इसने झारखंड जैसे खनिज समृद्ध राज्यों और केंद्र सरकार के बीच संवैधानिक अधिकारों व वित्तीय राजस्व की नई बहस छेड़ दी है। केंद्र सरकार का स्पष्ट मानना है कि मिनरल सिक्योरिटी ही इकोनॉमिक सिक्योरिटी है। यदि भारत स्टील, बुनियादी ढांचे, इलेक्ट्रिक वाहनों, रक्षा उपकरणों और रिन्यूएबल एनर्जी के लिए लिथियम, कोबाल्ट, निकेल, रेयर अर्थ एलिमेंट्स व कोकिंग कोल जैसे अति-महत्वपूर्ण खनिजों का भरोसेमंद घरेलू उत्पादन सुलभ नहीं कर पाता है, तो विदेशी आपूर्ति श्रृंखला और महंगे आयात पर देश की रणनीतिक निर्भरता बढ़ती जाएगी।
झारखंड के राजस्व और स्वायत्तता पर गहराया संकट
संशोधन कानून का खनिज बहुल राज्य झारखंड में तीखा विरोध शुरू हो गया है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को पत्र लिखकर इस कानून पर पुनर्विचार करने की पुरजोर मांग की है। मुख्यमंत्री सोरेन का स्पष्ट कहना है कि ‘खनिज और जमीन झारखंड की है’, ऐसे में राज्यों के कर लगाने के अधिकार को सीमित करना राज्य के वित्तीय हितों और संघीय ढांचे पर सीधा कुठाराघात है।
राज्य के आर्थिक सर्वेक्षण का हवाला देते हुए मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया है कि झारखंड के अपने गैर-कर राजस्व में खनन राजस्व का हिस्सा 84.9 प्रतिशत है। राज्य सरकार को खनिज युक्त भूमि उपकर (सैस) से सालाना लगभग 11,000 करोड़ रुपये के अतिरिक्त राजस्व की उम्मीद थी। इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट के नौ जजों की संविधान पीठ द्वारा वर्ष 2024 के ऐतिहासिक फैसले (एमएडीए बनाम सेल) के आधार पर झारखंड सरकार सार्वजनिक उपक्रमों से वर्ष 2005 से बकाया 1.36 लाख करोड़ रुपये के खनन राजस्व दावे की कानूनी लड़ाई लड़ रही है। राज्य का तर्क है कि इस विशाल राशि से विस्थापितों, आदिवासियों, दलितों और गरीबों के कल्याणकारी कार्य संचालित होने हैं।
निवेशकों की अनिश्चितता खत्म करने का केंद्रीय ढांचा
दूसरी ओर, केंद्र सरकार का तर्क है कि 1957 के मूल एमएमडीआर एक्ट में राज्यों द्वारा लगाए जाने वाले अतिरिक्त सेस और टैक्स की सीमाओं को स्पष्ट नहीं किया गया था। वर्ष 1989 के इंडिया सीमेंट्स मामले से लेकर वर्ष 2004 और फिर 2024 के सुप्रीम कोर्ट के फैसलों ने इस विषय पर अलग-अलग व्याख्याएं दीं। सुप्रीम कोर्ट के 2024 के फैसले ने भले ही राज्यों को खनिज युक्त भूमि पर कर लगाने की संवैधानिक शक्ति दी, लेकिन इससे खनन कंपनियों पर 2005 से हजारों करोड़ रुपये की अप्रत्याशित पुरानी देनदारियां (रिस्ट्रोस्पेक्टिव डिमांड) बनने का खतरा पैदा हो गया, जिससे माइनिंग प्रोजेक्ट्स आर्थिक रूप से अव्यवहारिक होने लगे थे।
नया एमएमडीआर संशोधन राज्यों की रॉयल्टी या नीलामी प्रीमियम की मौजूदा आय में कोई कटौती नहीं करता, बल्कि राज्यों द्वारा मनमाने ढंग से लगाए जाने वाले अतिरिक्त टैक्स, सेस व लेवी पर एक स्पष्ट राष्ट्रीय सीमा तय करता है। यदि अलग-अलग राज्यों में एक ही खनिज पर कर का बोझ अलग-अलग होगा, तो घरेलू उत्पादन महंगा हो जाएगा और ‘आत्मनिर्भर भारत’ व ‘विकसित भारत 2047’ का लक्ष्य प्रभावित होगा।
राष्ट्रीय हित और प्रांतीय अधिकारों में संतुलन जरूरी
वर्ष 2015 से ही केंद्र सरकार पारदर्शी नीलामी और त्वरित खनन पर जोर दे रही है। हालिया संशोधनों के तहत कोयला ब्लॉक के लिए इंश्योरेंस श्योरिटी बॉन्ड और कोकिंग कोल को रणनीतिक खनिज घोषित कर उत्पादन तेज करने का खाका तैयार किया गया है।
हालात यह दर्शाते हैं कि यह मामला केवल केंद्र और राज्य के बीच राजस्व के बंटवारे का नहीं है, बल्कि देश की समग्र औद्योगिक प्रतिस्पर्धात्मकता से जुड़ा है। तथापि, झारखंड जैसे विकासशील राज्य की वित्तीय निर्भरता को देखते हुए केंद्र और राज्यों के बीच संवाद का मार्ग प्रशस्त होना आवश्यक है, ताकि राष्ट्रीय खनिज सुरक्षा भी सुनिश्चित हो सके और राज्यों का न्यायसंगत वित्तीय हक भी सुरक्षित रहे।

