
जमशेदपुर : ‘मदर्स डे’ यानी मां के नाम समर्पित एक दिन। लेकिन क्या मां के त्याग और तपस्या को किसी एक दिन में समेटा जा सकता है? शहर के जाने-माने कथावाचक हरविंदर सिंह जमशेदपुरी ने मदर्स डे के अवसर पर समाज को एक गहरा संदेश दिया है। उनका मानना है कि मां के लिए साल का हर एक दिन सम्मान के योग्य है और इसे केवल एक दिन के ‘डिजिटल सेलिब्रेशन’ तक सीमित कर देना सही नहीं है। पढ़ें उनका यह विशेष आलेख:
मां एक सूरज के समान है
माँ एक सूरज के समान है जो रोज़ उदय होकर हमें रौशनी का एहसास कराती है। मां एक ऐसा उजाला है जिसकी रौशनी से हर घर चमकता है। हम अगर आज रोज़ सुबह का सूरज देख रहे हैं, तो वो सिर्फ और सिर्फ उस माँ की बदौलत है। एक बच्चे को अच्छी परवरिश देने और उसे एक अच्छा इंसान बनाने में मां अपनी पूरी जिंदगी के दुःख हंसते-हंसते सहने को तैयार रहती है। इसीलिए हमारे समाज में मां को भगवान का दर्जा दिया गया है। हमारे देश के विभिन्न धार्मिक ग्रंथों में भी मां के अपनी संतान और परिवार के प्रति असीम बलिदान का उल्लेख मिलता है।
दिखावे का डिजिटल प्रेम नहीं, सच्चा सम्मान चाहिए
आज के इस आधुनिक युग में माँ को बस एक दिन के लिए फेसबुक, ट्विटर, यूट्यूब, इंस्टाग्राम और व्हाट्सएप स्टेटस पर फोटो या वीडियो डालकर याद किया जाता है। यह डिजिटल प्रेम केवल सोशल मीडिया के दिखावे का हिस्सा न रहकर, हृदय से निकला सच्चा प्रेम और सम्मान होना चाहिए। मां को समर्पित बहुत सारे ऐसे जीवंत उदाहरण हैं जहां एक मां ने अपने बच्चे को साक्षात मौत के मुंह से खींचकर बचा लिया है।
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वृद्धाश्रम बंद हों और बने कड़ा कानून
अगर हमें वाकई में ‘मदर्स डे’ मनाना है, तो इसका सबसे बड़ा संकल्प यह होना चाहिए कि पूरे देश में चल रहे ‘वृद्ध आश्रम’ (Old Age Homes) हमेशा के लिए बंद हो जाने चाहिए। सरकार को एक ऐसा सख्त कानून बनाना चाहिए कि अपनी मां को घर से बेदखल करने वाली या उन्हें वृद्धाश्रम छोड़ने वाली संतान को तुरंत जेल की सजा होनी चाहिए। असली मदर्स डे उसी दिन सार्थक होगा।
मां की शक्ति के आगे दुनिया की कोई भी बुरी शक्ति कभी उसकी संतान को नुकसान नहीं पहुंचा सकती। मदर्स डे के इस पुनीत अवसर पर दुनिया की सभी माताओं को मेरा शत-शत नमस्कार और अभिनंदन है।
– हरविंदर सिंह जमशेदपुरी, कथावाचक ✍🏻


