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— कुमारी पूजन एवं माहवारी स्वच्छ्ता पर आधारित सामाजिक प्रयोग पर भी हुई चर्चा


जमशेदपुर, 28 अक्टूबर 2020 : नवरात्र के दौरान मां दुर्गा, नारियों व कुमारी पूजा की प्रथा है, जिसे हम बड़े ही धूमधाम से मनाते है। लेकिन महिलाओं को देवी स्वरूपा मानने वाले हमारे समाज में महिलाओं के प्रति अपराधों में कोई कमी होता नही दिखाई पड़ता। सामाजिक दोहरेपन की स्थिति को देखते हुए जनमानस के मन में सवाल उत्पन्न होता है, क्या नारी व नारी से जुड़े मुद्दे हमेशा सम्मानीय नहीं!! माहवारी स्वच्छ्ता को आम चर्चा का मुद्दा बनाने के उद्देश्य से सामाजिक संस्था निश्चय फाउंडेशन के द्धारा हर महीने की 28वी तारीख को आयोजित होने वाले इट्स वीमेंस प्राइड कार्यक्रम में सभी मुद्दों पर प्रमुखता से चर्चा की गयी।
इट्स वीमेंस प्राइड कार्यक्रम के 3.5वे संस्करण में “स्त्री पूजा, नारी सम्मान एवं माहवारी” के मुद्दे पर नौ देवियों के रूप में कार्यक्रम में उपस्थित वक्ता सुदीप्ता घोष, पुर्वी घोष, मोना बग्गा, रश्मि शर्मा, श्रेया भगत, अंजली कुमारी, सरस्वती कुमारी, रुपाली झा एवं वाई शैलजा जी ने विस्तार से अपने विचार रखे।
महिला किसान के रूप में समाज में मजबूत पहचान बनाने वाली सुदीप्ता घोष जी ने बताया की युवाओं के प्रेरणास्त्रोत स्वामी विवेकानंद जी ने कहा था कि नारी को शिक्षा दो, फिर वह तय कर लेगी, की क्या समाज के लिए सही है। स्त्री शिक्षा को बढ़ावा देकर ही समाज की मानसिकता में बदलाव लाया जा सकेगा। अब समय आ गया है की हम अपने घर से ही मिथकों को तोड़ने की शुरूआत करें।
लोक कलाकार रुपाली झा ने बताया कि “नवरात्र में मैंने नवरात्र का व्रत रखा था, चंडी पाठ की कहानी के अनुसार मां दुर्गा ने जब महिषासुर का वध कर दिया, तब देवताओं ने मां से आग्रह किया की जब कभी भी उन्हें जरूरत हो, तब मां उनकी मदद करने जरूर आये, तब मां दुर्गा ने आशीर्वाद देते हुए कहा की हर नारी में मेरा रूप हमेशा निहित रहेगा। जब हर नारी में मां दुर्गा का रूप निहित है, तब समाज में ऐसी सोच कैसे है कि हम असहाय है, नारी के प्रति समाज की सोच में बदलाव आये तो समाज और भी बेहतर होगा। कामख्या में मां के जिस रूप की पूजा की जाती है, उसी रूप को समाज में अछूत मानना कतई सही नहीं!! ”
समाजसेविका पूर्वी घोष ने बताया की “अब तो महिलाये भी मंदिरों में पुरोहित की भूमिका निभाने लगी है, यह समाज में आ रहे बड़े पैमाने पर बदलाव का निशानी है। अगर बच्चियों की माहवारी शुरू नहीं होती, तो परिवार वाले चिंतित होते है। तो फिर आम दिनों में ऐसा शर्म व झिझक क्यो??”
हजारीबाग से कार्यक्रम में साहित्यकार मोना बग्गा जी ने बताया की भारत देश के प्राचीन सभ्यता व संस्कारों में नारियों के प्रति हमेशा से सम्मान निहित है। लेकिन मुगलों के आने के बाद समाज में भय का माहौल बढ़ा, स्त्रियों की सुरक्षा की सोच से पर्दा प्रथा का चलन आ गया, तमाम सामाजिक परिस्थितियों से समाज की सोच धीरे धीरे विकृत होती चली गयी, जिसमें बदलाव अभी तक नहीं आ सका है, अब तो समाज में एकल परिवारो का चलन बढ़ा है, इस स्थिति में नारियों के प्रति सम्मान को स्थापित करने में परिवारों व माता-पिता की भूमिका ज्यादा अहम हो गयी है, नारी हमेशा सम्मानीय व महान है।
शिक्षिका रश्मि शर्मा ने बताया की हमे जो कुछ बचपन से सिखाया जाता है, वही हमारे मन में गहराई से बैठ जाता है। स्कूलों में माहवारी शिक्षा पर ज्यादा जोर देने की आवश्यकता है। लड़कियां ही नहीं लड़कों को भी इस विषय में बताने की जरूरत है। राष्ट्रपति पुरस्कार से नवाजी गयी स्वास्थ्य कार्यकर्ता वाई शैलजा जी ने बताया की बॉडी एनाटॉमी के बारे में बेहतर जानकारी हेतु समाज में बेहतर जागरुकता प्रयास करने की जरूरत है। इससे शारीरिक संरचना व बदलावो के बारे लोगो में बेहतर समझ विकसित होगी।
पत्रकारिता की छात्रा श्रेया भगत, अंजली कुमारी, सरस्वती, पूजा कुमारी ने भी अपने विचार रखे, उन्होंने प्रमुखता से बताया की एजुकेशन सिस्टम में बदलाव लाने की जरूरत है, महिलाये तुच्छ नहीं है, वह हर वह काम कर सकती है, जिसे पुरुष कर सकते है। बुनियाद से ही बच्चों में नारी सम्मान की भावना विकसित कर ही समाज को नारियों के लिए सुरक्षित बनाया जा सकता है।
कार्यक्रम के दौरान एक सामाजिक प्रयोग पर भी विस्तार से चर्चा की गयी। महाष्टमी के दौरान एक गाँव में कुमारी पूजन कार्यक्रम के दौरान नन्हीं बच्चियों को उपहार में पाठ्य सामग्रियां, सैनिटरी पैड व अन्य सामग्रियां दी गयी थी। कुमारी पूजन के दौरान बच्चियों के माध्यम से सैनिटरी पैड उनके घर भेजने का संदेश यह था की माहवारी का मुद्दा नारियों के सम्मान से जुड़ा हुआ है, माताएं नन्ही बच्चियों को भी समय से माहवारी जैसे अहम चीज़ो की जानकारी देने को जागरूक बने। चर्चा के दौरान लोगों ने प्रयोग की सराहना भी की, बताया की यह प्रयोग एक नए बदलाव की शुरुआत हो सकती है।
नौ देवी स्वरूपा वक्तताओं के विचारों के साथ-साथ शब्बीर हुसैन, सलमान, अंकुर सारस्वत व अन्य ने भी अपने विचार प्रमुखता से रखे। कार्यक्रम का संचालन निश्चय के पूनम महानंद एवं तरुण कुमार ने किया।

