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Home » Jharkhand Literature :साहित्य के ‘आनंद’ से आलोकित दुमका: डॉ. यू.एस. आनंद के रचनात्मक सात दशकों का सफर
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Jharkhand Literature :साहित्य के ‘आनंद’ से आलोकित दुमका: डॉ. यू.एस. आनंद के रचनात्मक सात दशकों का सफर

BJNN DeskBy BJNN DeskFebruary 6, 2026Updated:February 6, 2026No Comments4 Mins Read
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​दुमका |
​झारखंड की उपराजधानी दुमका की माटी ने समय-समय पर ऐसे मनीषियों को जन्म दिया है जिन्होंने अपनी लेखनी से राष्ट्रीय फलक पर अमिट हस्ताक्षर किए हैं। इन्हीं नामों में एक देदीप्यमान नक्षत्र हैं— डॉ. यू.एस. आनंद। 5 नवंबर 1954 को जन्मे डॉ. आनंद आज भी 71 वर्ष की आयु में उसी ऊर्जा के साथ हिन्दी साहित्य की सेवा कर रहे हैं, जैसे कोई युवा साधक अपनी पहली रचना लिख रहा हो।

READ MORE :http://Dumka literature news :अपूर्वया हिंदी मासिक के संपादक डॉ. यू.एस. आनंद को ‘सतीश स्मृति विशेष सम्मान–2026’

​साहित्यिक यात्रा: दोहों की सरिता से नाटकों के दर्पण तक

​डॉ. आनंद की कलम केवल कागज़ नहीं काले करती, बल्कि समाज का दर्पण बनती है। उनका नाटक ‘मुझे न्याय चाहिए’ सामाजिक विसंगतियों पर तीखा प्रहार करता है, वहीं उनके दोहा-संकलन ‘माटी कहे कुम्हार से’ में संकलित सौ से अधिक दोहे कबीर की परंपरा को आधुनिक संदर्भों में जीवित करते हैं।​उनकी विद्वत्ता का लोहा राष्ट्रीय स्तर पर तब माना गया जब राष्ट्रीय पुस्तक न्यास (NBT), दिल्ली ने उनकी कृति ‘तीन कंजूस’ को नव-साक्षर साहित्य माला के अंतर्गत प्रकाशित कर देशव्यापी पहचान दी।

​संपादकीय कौशल: ‘अपूर्व्या’ का गौरवपूर्ण सफर
​अक्टूबर 1996 से निरंतर प्रकाशित हो रही हिन्दी साहित्यिक मासिकी ‘अपूर्व्या’ के ध्वजवाहक संपादक के रूप में डॉ. आनंद ने दुमका जैसे शहर को पत्रकारिता के मानचित्र पर स्थापित किया है। उनके संपादन में निकलने वाली यह पत्रिका आज देशभर के साहित्यकारों और पाठकों के बीच एक विश्वसनीय सेतु का कार्य कर रही है। सम्मानों की अटूट श्रृंखला​हाल ही में ‘सतीश स्मृति विशेष सम्मान-2026’ से नवाजे गए डॉ. आनंद का सम्मान-कलश उपलब्धियों से भरा है।​साहित्यिक पत्रकारिता: आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी स्मृति-सम्मान (गाजियाबाद)।
​काव्य साधना: ज्योतिन्द्र प्रसाद झा पंकज पुरस्कार (भाषा-संगम)।

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​शिक्षा एवं समाज: राधा कृष्णश्री सम्मान और उपायुक्त (दुमका) द्वारा प्रशस्ति-पत्र।
​विशिष्ट सम्मान: आनंद शंकर माधवन साहित्यरत्न और बलभद्र नारायण सिंह बालेन्दु स्मृति-सम्मान।
​आकाशवाणी से जन-जन तक
​आकाशवाणी के पटना और भागलपुर केंद्रों से प्रसारित उनकी वार्ताओं और काव्य-पाठ ने ग्रामीण अंचलों की संवेदनाओं को स्वर दिया है। वर्तमान में वे तेलीपाड़ा मार्ग, दुमका स्थित अपने निवास से नई पीढ़ी के साहित्यकारों का मार्गदर्शन कर रहे हैं। उनके शोध-प्रबंध ‘प्रेमचंद के नारी दर्शन का अनुशीलन’ के प्रकाशन की साहित्य जगत को उत्सुकता से प्रतीक्षा है।

​निष्कर्ष: डॉ. यू.एस. आनंद केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि झारखंड की हिन्दी पत्रकारिता और साहित्य के एक जीवंत संस्थान हैं। उनकी यात्रा यह सिद्ध करती है कि यदि साधना सच्ची हो, तो छोटे शहरों की गलियों से निकली गूँज दिल्ली के गलियारों तक सुनाई देती है।

माटी की महक और जीवन का दर्शन: डॉ. यू.एस. आनंद के दोहे

​”माटी कहे कुम्हार से” – यह मात्र एक शीर्षक नहीं, बल्कि डॉ. यू.एस. आनंद जी के जीवन दर्शन का निचोड़ है। दुमका की माटी से उपजे उनके 100 से अधिक दोहे आज के दौर में कबीर की याद दिलाते हैं।उनकी भाषा सरल है, लेकिन चोट गहरी करती है। वे किताबी ज्ञान के बजाय जीवन के अनुभवों को छंदों में पिरोते हैं। नई पीढ़ी के लिए उनकी रचनाएँ एक नैतिक मार्गदर्शिका जैसी हैं।​ ‘अपूर्व्या’ के माध्यम से साहित्य की अलख जगाए हुए है।

​ अन्याय के विरुद्ध एक सशक्त कलम: डॉ. यू.एस. आनंद

​साहित्य वही है जो समाज को आईना दिखाए। डॉ. यू.एस. आनंद जी का नाटक ‘मुझे न्याय चाहिए’ केवल संवादों का संग्रह नहीं, बल्कि दबे-कुचले लोगों की चीख और उनके हक की लड़ाई है।
​एक प्रखर संपादक के रूप में पिछले 30 वर्षों से ‘अपूर्व्या’ पत्रिका के माध्यम से उन्होंने न केवल साहित्य को सहेजा है, बल्कि पत्रकारिता के मूल्यों को भी जीवित रखा है। हाल ही में ‘सतीश स्मृति विशेष सम्मान-2026’ से सम्मानित होना उनकी निरंतर सक्रियता का प्रमाण है।

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आनंद किशोर बिहार झारखंड न्यूज़ नेटवर्क में कॉपी एडिटर के रूप में कार्यरत हैं। वे सामाजिक मुद्दों, जनहित और मानवीय संवेदनाओं से जुड़ी खबरों पर विशेष रुचि रखते हैं। आनंद का उद्देश्य कमजोर और जरूरतमंद लोगों की आवाज को सही मंच तक पहुंचाना है। वे निष्पक्ष, सरल और प्रभावशाली पत्रकारिता में विश्वास रखते हैं।

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