जमशेदपुर।
जमशेदपुर पूर्वी की विधायक पूर्णिमा साहू ने टाटा मेन हॉस्पिटल (टीएमएच) में गरीब और जरूरतमंद मरीजों के इलाज तथा बिल माफी के मुद्दे पर कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने अस्पताल प्रबंधन और कॉर्पोरेट कार्यप्रणाली पर सीधा निशाना साधते हुए कहा है कि तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करना आसान है, लेकिन धरातल की सच्चाई इससे बिल्कुल अलग है। विधायक ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर इस पूरे मामले को लेकर एक विस्तृत पोस्ट लिखी है, जिसके बाद से शहर में इसे लेकर काफी चर्चा हो रही है और लोग इस पर अपनी अलग-अलग प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं।
सोशल मीडिया पर पोस्ट और प्रबंधन को चेतावनी
विधायक ने अपने सोशल साइट के माध्यम से स्पष्ट किया कि टीएमएच प्रबंधन द्वारा मरीजों को दी जाने वाली राहत किसी का ‘एहसान’ नहीं है। यह पूरी तरह से उनकी कॉर्पोरेट और कानूनी जिम्मेदारी है। उन्होंने अस्पताल प्रबंधन को कड़े शब्दों में चेतावनी देते हुए लिखा है कि हमारी विनम्रता को कमजोरी समझने की भूल बिल्कुल न की जाए। इस पोस्ट के वायरल होने के बाद स्थानीय लोग भी अस्पताल की नीतियों और सीएसआर फंड के उपयोग को लेकर सोशल मीडिया पर बहस कर रहे हैं।
जनप्रतिनिधियों के दबाव से ही मिलती है राहत
पूर्णिमा साहू ने बताया कि टीएमएच में रोजाना कई गरीब और असहाय मरीजों के बिल माफी के लिए जनप्रतिनिधियों को लगातार हस्तक्षेप करना पड़ता है। उन्होंने खुलासा किया कि हाल ही में कई महीनों तक बिल माफी की प्रक्रिया को यह कहकर रोक दिया गया था कि सीएसआर (CSR) फंड से निर्धारित सीमा से अधिक राशि पहले ही खर्च हो चुकी है। इसके बावजूद, उन्हें कई गंभीर मामलों में खुद हस्तक्षेप करना पड़ा, जहां भारी-भरकम बिल माफ करवा कर मरीजों के शव तक रिलीज करवाने पड़े। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार का सख्त निर्देश है कि ऐसी मानवीय परिस्थितियों में सहायता सुनिश्चित की जाए। यह दावा करना कि अस्पताल प्रबंधन खुद ब खुद सब कुछ कर रहा है, पूरी तरह गलत है; सच्चाई यह है कि जनप्रतिनिधियों के लगातार दबाव से ही पीड़ित परिवारों को राहत मिल पाती है।
सीएसआर फंड का उपयोग कंपनियों का कानूनी दायित्व
कानूनी पहलुओं का हवाला देते हुए विधायक ने बताया कि भारत में सीएसआर को कंपनी अधिनियम (Companies Act), 2013 की धारा 135 के तहत पूरी तरह अनिवार्य किया गया है। नियमों के अनुसार, योग्य कंपनियों को अपने पिछले तीन वर्षों के औसत शुद्ध लाभ का कम से कम 2 प्रतिशत हिस्सा सामाजिक कार्यों पर खर्च करना होता है। इसका उद्देश्य यह है कि बड़ी कंपनियां सिर्फ मुनाफा कमाने की मशीन न बनें, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण और जरूरतमंदों की सहायता जैसे क्षेत्रों में काम करके समाज के विकास में अपनी सक्रिय भागीदारी निभाएं। यह उनका नैतिक और कानूनी दायित्व है।
नाममात्र के टैक्स वाली जमीन पर जिम्मेदारी और भी बड़ी
विधायक ने एक और महत्वपूर्ण तथ्य की ओर ध्यान आकृष्ट कराया। उन्होंने कहा कि जिस जमीन पर टीएमएच का संचालन हो रहा है, उस पर सरकार को नाममात्र का टैक्स (प्रतीकात्मक रूप से मात्र 1 रुपये) दिया जाता है। सरकार द्वारा दी गई इस भारी छूट के कारण, अस्पताल प्रबंधन और कंपनी की समाज तथा स्थानीय लोगों के प्रति जिम्मेदारी कई गुना बढ़ जाती है। ऐसे में जनसेवा को किसी भी सूरत में बोझ नहीं माना जा सकता।
जनता को हक दिलाना हमारा परम कर्तव्य
अपने बयान के अंत में विधायक पूर्णिमा साहू ने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य किसी भी संस्थान को नीचा दिखाना या बेवजह विवाद खड़ा करना नहीं है, बल्कि आम जनता को उनका अधिकार और राहत दिलाना है। जनप्रतिनिधि होने के नाते वे जनता के लिए काम करती हैं और भविष्य में भी पूरी मजबूती से करती रहेंगी। यदि कोई भी कंपनी अपने इन सामाजिक दायित्वों को निभाने में कमी करती है, तो जनप्रतिनिधियों का प्राथमिक कर्तव्य है कि वे इसके खिलाफ आवाज उठाएं और दबाव बनाकर जनता को उनका पूरा हक दिलाएं।





