

जमशेदपुर। विजयादशमी के पावन अवसर पर पूरे देशभर में मां दुर्गा की प्रतिमाओं का विसर्जन नदी-तालाबों में किया गया। लेकिन जमशेदपुर के मानगो पूजा कमेटी की यह परंपरा अनोखी और ऐतिहासिक मानी जाती है। यहां मां दुर्गा की प्रतिमा को वाहनों से नहीं, बल्कि सुसज्जित डोली में बैठाकर नदी तक ले जाया जाता है। मानगो स्थित स्वर्णरेखा नदी के किनारे यह पूजा लगभग 67 वर्षों से निरंतर आयोजित हो रही है। इसकी स्थापना 1958 में स्वर्गीय जगतबंधु दत्त ने की थी। तभी से डोली परंपरा शुरू हुई, जो आज भी अपने स्वरूप और विधि-विधान के साथ जीवित है। डोली को हर वर्ष विजयादशमी से लगभग दो महीने पहले ही विशेष रूप से सजाया जाता है।
विधि-विधान और पूजा-अर्चना के बाद मां दुर्गा की प्रतिमा को इसी डोली में बैठाकर शोभायात्रा के रूप में नदी तक ले जाया जाता है। विसर्जन स्थल पर पारंपरिक वैदिक मंत्रोच्चार और कलश यात्रा के बीच मां की प्रतिमा का विधिपूर्वक विसर्जन किया जाता है। इस दौरान महिलाओं की भक्ति और श्रद्धा देखने योग्य होती है। महिलाएं विसर्जन से पहले मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित कर परिवार की समृद्धि और अखंड सौभाग्य की कामना करती हैं।
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पूरे आयोजन में श्रद्धालुओं की भावनाएँ एक साथ उमड़ती हैं। विदाई की पीड़ा और अगले वर्ष पुनः मां दुर्गा के स्वागत का विश्वास दोनों ही एक साथ झलकता है। महिलाएं नम आँखों से माता को विदाई देती हैं, जबकि डोली के आगे श्रद्धालु कलश लेकर चलकर इस परंपरा का हिस्सा बनते हैं।
जमशेदपुर की यह डोली परंपरा न केवल धार्मिक आस्था को जीवंत करती है, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक भी बन चुकी है। आधुनिकता के इस दौर में, जहां कई परंपराएं धीरे-धीरे लुप्त हो रही हैं, यह परंपरा पूरे क्षेत्र की पहचान बन चुकी है और हर वर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है।
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