
पटमदा / जमशेदपुर.
जिले के विद्यालयों में शनिवार को 2025 की आखिरी क्लास लगी, फिर विद्यालय शीतकालीन अवकाश के लिए बंद हो गए. छुट्टियों का सकारात्मक उपयोग बच्चे किताबें और कहानियां पढ़कर कर सकते हैं, इसी संदेश के साथ भारतीय जन नाट्य संघ से जुड़े लिटिल इप्टा के नौ बाल रंगकर्मी महासचिव अर्पिता के नेतृत्व में पटमदा के एस एस +2 उच्च विद्यालय पहुंचे. अपनी उम्र के बच्चों को बाल कलाकार के रूप में देखने के लिए विद्यालय के सैकड़ों बच्चे विद्यालय प्रागंण में ही स्थित अम्बेडकर भवन के पास जुटे हुए थे.
READ MORE :Adityapur News :29 दिसंबर को आदित्यपुर औद्योगिक क्षेत्र में शिफ्ट टाइम बदला, जानें नया समय
नन्हें बाल रंगकर्मी साहिल, दिव्या, नम्रता, गुंजन, अभिषेक, सुरभि, सुजल, काव्या और श्रवण की टोली ने शुरुआत में संथाली लोकगीत सुनाकर कार्यक्रम की शुरुआत की, फिर हिंदी भाषा के जनवादी गीतों के माध्यम से समाज में बराबरी और समानता का सन्देश दिया. बच्चों के गीतों को सुनकर सभी मंत्रमुग्ध थे, उसके बाद बच्चों ने अफ्रीकी लोककथा “लोहे का आदमी” का मंचन किया, जिसका हिंदी रूपांतरण मशहूर कवि मंगलेश डबराल ने किया है.
अफ्रीकी लोककथा में राजा ने लुहारन को एक ऐसा आदमी बनाने का आदेश दिया, जो जिंदा आदमी की तरह बोलता हो, चलता फिरता हो. राजा के अटपटे से आदेश को भी भला कौन मना कर सकता था, जान जाने का डर था, इस हाल में आगे क्या हुआ, लुहारन की जान बची या नहीं… 25 मिनट के नाटक ने असम्भव से दिखने वाले लक्ष्य को भी हासिल करने के रास्ते तलाशने हेतु सोचने की प्रेरणा दी.
READ MORE ;Jasidih-Jhajha Rail Accident :सीमेंट लदी मालगाड़ी बेपटरी, हावड़ा-दिल्ली मेन लाइन ठप
बाल रंग कर्मियों के बेमिसाल प्रदर्शन की बच्चों व बड़ों ने जोरदार तालियां बजाकर प्रशंसा की. वहीं विद्यालय के प्रधानाध्यापक डॉ मिथिलेश कुमार ने कलाकारों को गुलदस्ता और इनाम में नकद राशि देकर पुरस्कृत किया. मौके पर इप्टा झारखंड की महासचिव अर्पिता, सामाजिक संस्था निश्चय फाउंडेशन के संस्थापक तरुण कुमार, जेंडर कार्यकर्ता सोमाय लोहार, विद्यालय के शिक्षक और शिक्षिकाएं प्रमुख रूप से उपस्थित थीं.
कार्यक्रम के माध्यम से बच्चों को यह सीख देने की कोशिश हुई कि हम भले ही किसी गांव में, किसी भूगोल में रहते रहे हों, लेकिन दुनिया भर के अलग-अलग क्षेत्र के भाषाओं की कहानियों के माध्यम से हम काफी कुछ सीख सकते हैं. अपनी बात को कहने का बेहतरीन जरिया लेखन और रंगकर्म भी होता है, इसमें उम्र भी आड़े नहीं आती.



