जमशेदपुर.
जमशेदपुर में ट्रैफिक चेकपोस्ट की वीडियो बनाने पर ट्रैफिक डीएसपी द्वारा जेल भेजने की मौखिक चेतावनी का मामला अब लगातार तूल पकड़ता जा रहा है. आरटीआई कार्यकर्ता अंकित आनंद द्वारा इस मामले को लेकर झारखंड विधानसभा की प्रत्यायुक्त समिति को पत्र लिखने के बाद, अब शहर के जाने-माने एडवोकेट सुधीर कुमार पप्पू ने भी एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर पुलिस के इस आदेश पर कड़े सवाल खड़े किए हैं. उन्होंने इसे “चेकिंग या चेकमेट” करार देते हुए नागरिक अधिकारों के हनन का बड़ा मुद्दा उठाया है.
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नागरिकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सीधा प्रहार
एडवोकेट सुधीर कुमार ‘पप्पू’ ने कहा कि पुलिस द्वारा चेकपोस्ट का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर वायरल करने वालों को जेल भेजने की चेतावनी पहली नजर में कानून-व्यवस्था बनाए रखने की सख्ती लग सकती है, लेकिन यह कई गंभीर संवैधानिक सवाल भी खड़े करती है. भारत का संविधान नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है. संविधान के अनुच्छेद 19 (Article 19) के तहत हर व्यक्ति को सार्वजनिक स्थानों पर होने वाली गतिविधियों को रिकॉर्ड करने और साझा करने का मौलिक अधिकार है, खासकर जब वह मामला सार्वजनिक प्राधिकरणों के कार्य से जुड़ा हो. ऐसे में, बिना किसी स्पष्ट कानूनी प्रावधान के “वीडियो बनाने पर जेल” की blanket (व्यापक) धमकी देना नागरिकों के अधिकारों पर अनुचित दबाव है और सीधे तौर पर अनुच्छेद 19 का खुला उल्लंघन है.
चेकिंग प्रक्रिया की पारदर्शिता पर उठे गंभीर सवाल
एडवोकेट पप्पू ने चेकिंग प्रक्रिया की वैधता और पारदर्शिता पर भी सवाल उठाया. उन्होंने कहा कि अक्सर यह देखा गया है कि पुलिस बिना किसी स्पष्ट अधिसूचना (Notification) के अचानक वाहन जांच शुरू कर देती है. कई बार पुलिसकर्मी अचानक तेज रफ्तार गाड़ियों के सामने आ जाते हैं या उनके पीछे दौड़ते हैं, जिससे दुर्घटनाओं का खतरा काफी बढ़ जाता है. ऐसे में यदि नागरिक इन घटनाओं का वीडियो बनाते हैं, तो यह केवल उनके अधिकार का प्रयोग नहीं है, बल्कि सार्वजनिक सुरक्षा और जवाबदेही सुनिश्चित करने का एक सशक्त माध्यम है. यदि पुलिस की जांच प्रक्रिया पूरी तरह वैध और पारदर्शी है, तो वीडियो से डरने की क्या आवश्यकता है? ऐसे वीडियो कई बार अवैध वसूली या अनुचित व्यवहार को उजागर करने में भी सहायक साबित होते हैं.
पुलिस की मनमानी पर रोक
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प्रेस रिलीज में एडवोकेट सुधीर कुमार पप्पू ने सवाल किया है कि यदि चेकिंग प्रक्रिया स्वयं स्पष्ट नियमों और अधिसूचनाओं के बिना संचालित हो रही है, तो उस पर प्रश्न उठाना और उसे रिकॉर्ड करना नागरिकों का वैध अधिकार है. इससे पुलिस की मनमानी पर रोक लगती है. यह सही है कि लोकेशन साझा करने से कुछ लोग जांच से बच सकते हैं, लेकिन इसका समाधान यह कतई नहीं है कि सभी प्रकार की वीडियो रिकॉर्डिंग पर रोक लगाकर उसे अपराध घोषित कर दिया जाए. कानूनी कार्रवाई केवल उन पर होनी चाहिए जो जानबूझकर अपराधियों को बचने में मदद कर रहे हों या भ्रामक जानकारी फैला रहे हों.
लोकतांत्रिक व्यवस्था में पुलिस और जनता के बीच विश्वास जरूरी
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अंत में, सुधीर कुमार पप्पू ने स्पष्ट किया कि एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में पुलिस और आम जनता के बीच विश्वास और पारदर्शिता का होना सबसे महत्वपूर्ण है. व्यवस्था बनाए रखने के लिए सख्ती आवश्यक है, लेकिन वह पूरी तरह से कानून के दायरे में और नागरिक अधिकारों का पूर्ण सम्मान करते हुए होनी चाहिए. अन्यथा, चेकिंग का यह तंत्र कानून लागू करने के बजाय नागरिक स्वतंत्रताओं पर “चेकमेट” साबित होगा.





