
जमशेदपुर। मैग्सेसे पुरस्कार विजेता और देश के ‘जलपुरुष’ राजेंद्र सिंह ने विकास के आधुनिक मॉडल पर तीखा प्रहार किया है। उन्होंने साफ लहजे में कहा कि यदि हम प्रकृति को ‘माई’ (माँ) कहकर सिर्फ कमाई का जरिया बनाएंगे, तो न नदियां बचेंगी और न ही पहाड़। नदी और पहाड़ को केवल इकोनॉमिक इन्फ्रास्ट्रक्चर (आर्थिक ढांचा) मानना बेहद गलत सोच है। दुर्भाग्य की बात यह है कि आज भारत के विकास में प्राकृतिक संसाधनों को केवल इसी नजरिए से देखा जा रहा है।
जमशेदपुर के मोतीलाल नेहरू पब्लिक स्कूल के ऑडिटोरियम में आयोजित ‘राष्ट्रीय नदी पर्वत सम्मेलन’ के समापन समारोह की अध्यक्षता करते हुए उन्होंने ये बातें कहीं। राजेंद्र सिंह ने कहा कि वर्तमान में सरकार का एजेंडा रेयर मैटेरियल को ज्यादा से ज्यादा निकालना है, जबकि हमारा रास्ता और कानून प्रकृति को बचाने का है।
जमशेदपुर घोषणा पत्र: घर-घर तक पहुंचेगी आवाज
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राजेंद्र सिंह ने घोषणा की कि ‘जमशेदपुर घोषणा पत्र’ जारी हो चुका है। अब जिम्मेदारी आम जनता की है कि वे अपने घर, मोहल्ले और समाज में इस पर चर्चा करें। केवल ड्राफ्ट बना देने से कानून नहीं बनेगा, इसके लिए जमीन पर उतरकर जनमत तैयार करना होगा। उन्होंने बताया कि इस मुहिम को आगे बढ़ाने के लिए वह बेंगलुरु जा रहे हैं, जहां विधायकों और विशेषज्ञों के साथ इस प्रस्तावित कानून पर मंथन होगा।
सोशल मीडिया और युवाओं की भूमिका अहम
जलपुरुष ने जोर देकर कहा कि इस कानून को अमलीजामा पहनाने के लिए देश में एक बड़ा माहौल बनाने की जरूरत है। इसके लिए सोशल मीडिया, प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का भरपूर इस्तेमाल किया जाना चाहिए। उन्होंने शिक्षण संस्थानों और प्रोफेसरों से अपील की कि वे विद्यार्थियों को इस मुहिम के लिए मोटिवेट करें। गांवों और पंचायतों तक जाकर सांसदों-विधायकों से संवाद स्थापित करना होगा। उन्होंने कहा, “अब मेरा जीवन सिर्फ इसी कानून को बनवाने के लिए समर्पित है।”
प्रकृति और संस्कृति के बिना विकास अधूरा
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इतिहास का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि जब तक भारत में संस्कृति और प्रकृति के योग (संतुलन) से विकास हो रहा था, तब दुनिया में भारत की जीडीपी 32 प्रतिशत थी। यह महज 200 साल पुरानी बात है। लेकिन जब से विकास का नया पश्चिमी मॉडल आया है, हमारे पारंपरिक ज्ञान का विस्थापन हो गया है। आज के इस अंधे विकास में सिर्फ विनाश छिपा है।
जमशेदपुर घोषणा पत्र: कानून के ड्राफ्ट के मुख्य सुझाव
सम्मेलन के समापन पर कानून के मसौदे को मजबूत करने के लिए कई अहम सुझाव आए:
सरल भाषा: कानून की भाषा ऐसी हो जो आम आदमी को आसानी से समझ आ सके।
समानता का कोर्ट: कोर्ट रूम का ढांचा ऐसा हो जहां जज और वकील गोलाकार टेबल पर बैठकर चर्चा कर सकें।
वैज्ञानिक संस्थाओं को पावर: साइंटिफिक संस्थानों और पॉलिसी मेकर्स को इस कानून में मजबूत स्थिति दी जाए।
पहाड़ की स्पष्ट परिभाषा: पहाड़ और रिवर बेसिन प्रोटेक्शन की ऐसी सम्यक परिभाषा तय हो, जिसे कोई कानूनी चुनौती न दे सके।
खनन पर रोक: वैध-अवैध खनन पर विस्तार से नीति बने और पहाड़ों पर ब्लास्टिंग को पूरी तरह प्रतिबंधित किया जाए।




