जमशेदपुर।
झारखंड की इस्पात नगरी जमशेदपुर में कला, संस्कृति और सामाजिक सरोकार का एक अनूठा संगम देखने को मिला। शहर में इंस्टीट्यूट फॉर सोशल डेमोक्रेसी (आईएसडी) और विभिन्न स्थानीय संस्थाओं के संयुक्त तत्वावधान में एक भव्य ‘साझा महोत्सव’ का आयोजन किया गया। इस महोत्सव में कलाधाम, झारखंड सांस्कृतिक मंच, इप्टा जमशेदपुर, कला क्रिएशन, उदय मूवीज़ और गोमहेद अखाड़ा जैसे प्रतिष्ठित संगठनों ने अपनी सक्रिय भागीदारी निभाई। इस आयोजन ने न केवल दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया, बल्कि समाज को कई गहरे संदेश भी दिए।
लोकगीत और नृत्य से सजी सांस्कृतिक संध्या
साझा महोत्सव की शुरुआत रंगारंग सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के साथ हुई। उदय मूवीज़ की टीम ने शानदार ‘छत्तीसगढ़ी लोक नृत्य’ प्रस्तुत कर दर्शकों को थिरकने पर मजबूर कर दिया। इसके बाद गोमहेद अखाड़ा की ओर से रामचंद्र मार्डी, उर्मिला हांसदा, आकाश और आदित्य ने अपनी सुरीली आवाज़ में ‘संताली गीत’ पेश किए। इन पारंपरिक धुनों और लोकगीतों ने झारखंड की माटी की महक को मंच पर जीवंत कर दिया।
रंगमंच पर जलवायु संकट और व्यंग्य की गूंज
महोत्सव में नाटकों और एकल प्रस्तुतियों का विशेष आकर्षण रहा। कला क्रिएशन की ओर से मसरूर सिद्दीकी ने मशहूर व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई की प्रसिद्ध रचना ‘मैं नर्क से बोल रहा हूं’ पर एक बेहतरीन एकल प्रस्तुति (सोलो एक्ट) दी, जिसने दर्शकों को हंसने और सोचने दोनों पर विवश कर दिया। वहीं, कला धाम द्वारा गौतम गोप के लेखन और निर्देशन में ‘पानी रे पानी – हाय रे पानी’ नाटक का सफल मंचन किया गया। यह नाटक पूरी तरह से वर्तमान के ‘जलवायु संकट’ पर आधारित था, जिसने जल संरक्षण की अहमियत को बड़ी ही संजीदगी से दर्शकों के सामने रखा। इसके अलावा ‘लिटिल इप्टा जमशेदपुर’ के बाल कलाकारों ने ‘लोहे का आदमी’ नाटक का शानदार मंचन कर खूब तालियां बटोरीं।
आर जे राज की मिमिक्री और सफल संचालन
पूरे कार्यक्रम को एक सूत्र में पिरोने का काम आर जे राज ने किया। उन्होंने अपने बेहतरीन संचालन और शानदार मिमिक्री से कार्यक्रम में चार चांद लगा दिए। आर जे राज ने विशेष रूप से दर्शकों में मौजूद बच्चों पर अपना ध्यान केंद्रित रखा और उनके साथ खूब संवाद किया, जिसकी वहां मौजूद सभी लोगों ने काफी तारीफ की।
सांस्कृतिक मंच और साझापन है मुख्य उद्देश्य
इस अनूठे आयोजन के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए शिवलाल सागर ने बताया कि इस कार्यक्रम का मुख्य लक्ष्य समाज में ‘सांस्कृतिक साझापन’ (Cultural Commonality) को बढ़ावा देना है। वहीं, गौतम गोप ने बताया कि इस महोत्सव को आयोजित करने का विजन स्थानीय स्तर पर शहर की सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के लिए एक ‘मासिक मंच’ और संवाद के लिए एक ‘साझा मंच’ तैयार करना है। इसका मकसद कलाकारों के बीच मेलजोल बढ़ाना और उन्हें अपनी कला प्रदर्शित करने का नियमित अवसर देना है।
समय की पाबंदी और दर्शकों का सम्मान इस आयोजन की सबसे बड़ी और सराहनीय बात यह रही कि कार्यक्रम बिल्कुल अपने तय समय पर शुरू हुआ। आयोजकों का मानना था कि जो दर्शक समय निकालकर पहले पहुंच गए हैं, यह उनका यथोचित सम्मान है। महोत्सव में दर्शकों की उपस्थिति काफी अच्छी रही, और खास बात यह थी कि ‘कलाकार ही दर्शक’ की भूमिका में भी नज़र आए, जिससे पूरा माहौल एक पारिवारिक और कलात्मक उत्सव में तब्दील हो गया।






