
भोजपुरी, मैथिली और मगही सिनेमा को ‘सस्ता मनोरंजन’ के टैग से बाहर निकाल रच रहे हैं इतिहास
Anni Amrita

पटना/मुंबई/जमशेदपुर
जब भी भोजपुरी या बिहार के क्षेत्रीय सिनेमा की बात होती है, तो अक्सर लोगों के दिमाग में लाउड म्यूजिक, फूहड़ता और घिसे-पिटे फॉर्मूले ही सामने आते हैं. लेकिन इसी दौर में एक ऐसा फिल्ममेकर भी है, जिसने इस घिसे-पिटे ढर्रे को तोड़कर बिहार की मिट्टी, संस्कृति और वहां की भाषाओं (भोजपुरी, मैथिली, मगही) को बेहद संजीदगी और सम्मान के साथ बड़े पर्दे पर उतारा है. यह नाम है— नितिन नीरा चंद्रा.
नितिन चंद्रा आज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं. वे एक ऐसे फिल्म निर्देशक, लेखक और निर्माता के रूप में उभरे हैं, जिन्होंने बिहार के सिनेमा को ‘क्रिटिकल एकलेम’ (समीक्षकों की सराहना) और अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई है.
‘देसवा’ से ‘मिथिला मखान’ तक का ऐतिहासिक सफर
नितिन चंद्रा के करियर और बिहार के सिनेमा इतिहास में सबसे बड़ा मील का पत्थर तब आया, जब उनकी मैथिली फिल्म ‘मिथिला मखान’ (Mithila Makhaan) को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार (National Film Award) से नवाजा गया. यह पहली बार था जब किसी मैथिली फिल्म को राष्ट्रीय स्तर पर इतना बड़ा सम्मान मिला. इस फिल्म ने साबित किया कि अगर नीयत साफ हो, तो क्षेत्रीय भाषाओं में भी ‘क्लास सिनेमा’ बनाया जा सकता है. इससे पहले, उन्होंने भोजपुरी में ‘देसवा’ जैसी बेहतरीन और यथार्थवादी फिल्म बनाई, जिसने कई अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सवों में देश का प्रतिनिधित्व किया.
हालिया प्रोजेक्ट्स: ‘करियट्ठी’ और ‘छठ’ के जरिए संवेदनशीलता और सामाजिक संदेश
नितिन चंद्रा अपनी कहानियों से लगातार रूढ़ियों को तोड़ रहे हैं. हाल के दिनों में उनकी फिल्मों ने समाज के संवेदनशील मुद्दों को छुआ है:
’करियट्ठी’ (Kariyatthi): नितिन चंद्रा की यह फिल्म रंगभेद (Skin Color Discrimination) और समाज में महिलाओं की स्थिति जैसे गंभीर सामाजिक विषय पर चोट करती है. अपनी खास मेकिंग और संजीदा कहानी के कारण यह फिल्म लगातार चर्चा में बनी हुई है.
’छठ’ (Chhath): बिहार के सबसे बड़े सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महापर्व ‘छठ’ को केंद्र में रखकर बनाई गई यह फिल्म प्रवासन (Migration), अपनी जड़ों की ओर लौटने की छटपटाहट और पारिवारिक ताने-बाने को बेहद खूबसूरती से दर्शाती है. यह फिल्म दुनिया भर में फैले बिहार के लोगों के दिलों को सीधे छूती है.
‘बेजोड़’ (Bejod): बिहार की भाषाओं के लिए ‘बेजोड़’ एक डिजिटल क्रांति है. बिहार की समृद्ध भाषाई विरासत को सहेजने और उसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए उन्होंने ‘बेजोड़’ (Bejod) नाम का एक अनूठा डिजिटल प्लेटफॉर्म/ओटीटी (OTT) शुरू किया.
इस प्लेटफॉर्म के जरिए नितिन ने कई महत्वपूर्ण काम किए:
साफ-सुथरा संगीत: उन्होंने भोजपुरी और मैथिली में अश्लीलता से दूर, बेहद खूबसूरत और लोक संगीत को पुनर्जीवित किया.
साहित्यिक जुड़ाव: बिहार के कवियों और लेखकों की रचनाओं को आधुनिक अंदाज में युवाओं के सामने पेश किया.
नए कलाकारों को मंच: ‘बेजोड़’ के जरिए बिहार के स्थानीय कलाकारों, गायकों और तकनीकी जानकारों को एक बड़ा प्लेटफॉर्म मिला.
“सिनेमा सिर्फ मनोरंजन नहीं, संस्कृति का रक्षक है”
नितिन चंद्रा हमेशा इस बात की वकालत करते हैं कि सिनेमा किसी भी समाज की संस्कृति का चेहरा होता है. अभिनेत्री नीतू चंद्रा(उनकी बहन) के साथ मिलकर उनकी प्रोडक्शन कंपनी ‘चंपारण टॉकीज’ लगातार ऐसी कहानियां सामने ला रही है, जो बिहार के समाज का सही आइना हैं. एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था–
”अगर हम अपनी भाषा में घटिया कंटेंट परोसेंगे, तो हमारी आने वाली पीढ़ी अपनी ही भाषा और संस्कृति से शरमाने लगेगी. मेरा मकसद सिर्फ फिल्म बनाना नहीं, बल्कि अपनी भोजपुरी, मैथिली और मगही भाषा को वह सम्मान दिलाना है, जिसकी वे हकदार हैं.”
नितिन चंद्रा बिहार के रीजनल सिनेमा को उस मुकाम पर ले जाने की लड़ाई लड़ रहे हैं, जहां कभी महान फिल्मकार अपनी भाषाओं को लेकर गए थे. ‘करियट्ठी’ और ‘छठ’ जैसी फिल्मों के साथ उनका यह योगदान आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणा है कि कैसे अपनी जमीन से जुड़े रहकर भी पूरी दुनिया को अपनी कहानी सुनाई जा सकती है. उनके साक्षात्कारों या उनके सोशल मीडिया के पोस्टों में मातृभाषा के संवर्द्धन को लेकर अनवरत प्रयासरत रहने के प्रति उनका दृढ संकल्प तो झलकता ही है, मातृभाषा का मजाक उड़ाने या फूहड़ता परोसने को लेकर दर्द भी दिखता है और वे चाहते हैं कि ये दर्द सबको हो और सब अपनी मातृभाषा के उत्थान के लिए आगे आएं..


