
जमशेदपुर में दक्षिण भारतीय संस्कृति की अनूठी झलक, नवरात्रि पर घरों में सजी ‘गोलू पूजा’.
Anni Amrita
जमशेदपुर.
भारत की विविधतापूर्ण सांस्कृतिक परंपराओं की श्रृंखला में नवरात्रि के अवसर पर दक्षिण भारत की प्रसिद्ध ‘गोलू पूजा’ ने शहर के बहु सांस्कृतिक ताने-बाने को और समृद्ध कर दिया है. कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में विशेष रूप से प्रचलित इस परंपरा के तहत नवरात्रि के दौरान घरों में गुड़ियों और देवी-देवताओं की मूर्तियों को सजी हुई सीढ़ियों पर क्रमबद्ध ढंग से सजाया जाता है. मिनी भारत कहे जाने वाले जमशेदपुर शहर में यह परंपरा विभिन्न संस्कृतियों के आपसी मेल-मिलाप का सुंदर उदाहरण पेश करती है.
क्या है गोलू पूजा और इसकी परंपरा?
दक्षिण भारतीय परिवारों में नवरात्रि के दौरान लकड़ी, धातु या अन्य सामग्री से बनी सीढ़ियों पर सुंदर वस्त्र बिछाकर विभिन्न प्रकार की मूर्तियाँ सजाई जाती हैं. तमिल भाषा में इन सीढ़ियों को ‘पड़ी’ कहा जाता है, जिनकी संख्या सामान्यतः विषम (तीन, पाँच, सात या नौ) होती है. बचपन से जमशेदपुर में पले बढ़े
टाटा स्टील के वरिष्ठ पदाधिकारी दिलीप नारायण बताते हैं कि उन्हें गोलू सजाने में विशेष रुचि रही है. उनकी पत्नी सुधा दिलीप के अनुसार, गोलू केवल धार्मिक सजावट नहीं है, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक प्रदर्शनी है, जिसमें धर्म, इतिहास, कला और सामाजिक जीवन का समन्वय दिखाई देता है.
सीढ़ियों पर सजती है सृष्टि की जीवंत गाथा
गोलू की सजावट में एक खास क्रम का पालन किया जाता है-
ऊपरी सीढ़ियाँ-इन पर प्रमुख देवी-देवताओं की मूर्तियाँ स्थापित की जाती हैं.
मध्य सीढ़ियाँ-यहाँ संतों, महापुरुषों और पौराणिक कथाओं के पात्रों की प्रतिमाएँ रखी जाती हैं.
निचली सीढ़ियाँ-इन पर पशु-पक्षियों, इंसानों और ग्रामीण जीवन से जुड़ी आकृतियों को सजाया जाता है.
इस प्रकार गोलू भारतीय जीवन की विविधता और सांस्कृतिक समृद्धि को बहुत ही सहज रूप से अभिव्यक्त करता है.
शहर में दिखा पारंपरिक उल्लास और सामुदायिक सहभागिता
जमशेदपुर के सोनारी के दिलीप नारायण सहित श्रीप्रिया धर्मराजन और अंजलि गणेशन जैसे कई तमिल परिवारों ने इस परंपरा का उत्साहपूर्वक निर्वाह किया है. हर साल नई प्रतिमाएँ जोड़ने की परंपरा के कारण गोलू के दर्शन में हमेशा नवीनता बनी रहती है. चूँकि ऐसी विशेष प्रतिमाएँ जमशेदपुर में आसानी से उपलब्ध नहीं होती हैं, इसलिए कई परिवार इन्हें विशेष रूप से तमिलनाडु से मँगवाते हैं.
गोलू देखने के लिए पड़ोस की महिलाएँ, बच्चे और अन्य परिजन एकत्र होते हैं. दिलीप नारायण के आवास पर केवीके समाज, सोनारी की महिला मंडली ने विशेष रूप से उपस्थित होकर भजन प्रस्तुत किए, जिससे पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया.
गणमान्य अतिथियों ने की सराहना
इस सांस्कृतिक आयोजन की भव्यता को देखने के लिए शहर के कई प्रतिष्ठित लोग पहुँचे. डीबीएमएस कॉलेज की मार्गदर्शक एवं सलाहकार डॉ. जूही समर्पिता, प्राचार्या डॉ. मोनिका उप्पल, पामेला घोष दत्ता, कई शिक्षिकाएँ, टाटा स्टील के वरिष्ठ पदाधिकारी, डॉ. अंजनी किशोर सहाय तथा डीबीएमएस के चेयरपर्सन डॉ. बी. चन्द्रशेखर, ललिता चन्द्रशेखर और प्रबंधन समिति के सदस्यों ने गोलू की सजावट की भूरी-भूरी प्रशंसा की.
गोलू पूजा देखने पहुंचे अतिथियों ने कहा कि जमशेदपुर जैसे बहु सांस्कृतिक शहर में ऐसे आयोजन यह सिखाते हैं कि विविधता केवल अलग-अलग परंपराओं का सह-अस्तित्व नहीं है, बल्कि यह एक-दूसरे की संस्कृति को जानने, समझने और उसका सम्मान करने का एक सुनहरा अवसर भी है.
गोलू पूजा का इतिहास
जानकार बताते हैं कि विजयनगर साम्राज्य(14वीं शताब्दी) के काल में हम्पी की गलियों और शाही दरबारों में नवरात्रि पर सीढ़ियों पर मूर्तियों और गुड़ियों को सजाने की परंपरा शुरु हुई. बाद में मैसूर के वोडेयार परिवारों और तंजावुर के मराठा शासकों ने इस परंपरा को और आगे बढाया. वहीं धार्मिक मान्यताओं के अनुसार महिषासुर से युद्ध के दौरान जब मां दुर्गा को अपनी शक्तियों की जरुरत पड़ी, तो सभी देवी-देवताओं ने अपनी दिव्य शक्तियां उन्हें समर्पित कर दी और खुद मूर्ति के रुप में स्थिर हो गए. गोलू उसी दिव्य सभा और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक माना जाता है.


