जमशेदपुर । साकची स्थित वेद अध्ययन अनुशीलन केंद्र में रविवार को भगवान परशुराम का जन्मोत्सव अत्यंत हर्षोल्लास, अपार श्रद्धा और धार्मिक मान्यताओं के साथ मनाया गया। इस भव्य और आध्यात्मिक कार्यक्रम का आयोजन शहर के प्रतिष्ठित ‘धर्मरक्षिनी पौरोहित्य महासंघ’ के तत्वावधान में किया गया था। इस पावन अवसर पर जमशेदपुर के विभिन्न क्षेत्रों से आए विद्वान आचार्यों ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज कराई और वैदिक परंपराओं के अनुसार पूरे अनुष्ठान को विधि-विधान से संपन्न किया। पूरे आयोजन के दौरान मंदिर परिसर का वातावरण पूरी तरह से भक्तिमय रहा और भगवान परशुराम के जयकारे लगातार गूंजते रहे।
सामूहिक स्वस्तिवाचन और वैदिक मंत्रोच्चार से शुरू हुआ अनुष्ठान
कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ उपस्थित आचार्यों द्वारा किए गए सामूहिक स्वस्तिवाचन और वैदिक मंत्रोच्चार के साथ हुआ। पूजा के शास्त्रीय और निर्धारित क्रम का पूरी निष्ठा से पालन करते हुए, सबसे पहले विघ्नहर्ता भगवान गणपति और माता अंबिका का आह्वान व पूजन किया गया। इसके पश्चात वरुण पूजन, नवग्रह पूजन और मातृका पूजन पूरी धार्मिक आस्था के साथ संपन्न कराया गया। इन सभी देवी-देवताओं के आह्वान के बाद मुख्य रूप से भगवान परशुराम की विशेष और भव्य पूजा-अर्चना की गई। पूजन के उपरांत 108 बत्तियों वाले दीप से भगवान परशुराम की महाआरती (नीराजन) की गई, जिसका दिव्य दर्शन इस कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण रहा।
अधर्म के नाश और धर्म की स्थापना के लिए हुआ था अवतार
इस अवसर पर उपस्थित विद्वान आचार्यों ने भगवान परशुराम के जीवन, उनके महान चरित्र और उनके अवतार के मुख्य उद्देश्यों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने श्रद्धालुओं को बताया कि भगवान परशुराम माता रेणुका और महान ऋषि जमदग्नि के पुत्र हैं। जब-जब पृथ्वी पर अधर्म, अन्याय और पाप का बोझ बढ़ता है, तब-तब ईश्वर राम, कृष्ण, बलराम और परशुराम के रूप में अवतार लेकर पृथ्वी पर सुख, शांति और धर्म की पुनर्स्थापना करते हैं।
भगवान परशुराम को भगवान विष्णु का छठा अंशावतार माना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, उन्होंने भगवान शिव की अत्यंत कठोर आराधना की थी, जिससे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अपना अमोघ अस्त्र ‘परशु’ (फरसा) प्रदान किया था। इसी के बाद से वे ‘परशुराम’ कहलाए। भगवान शिव से ही उन्होंने धनुर्विद्या का सर्वोच्च ज्ञान प्राप्त किया था और आगे चलकर कृपाचार्य, कर्ण जैसे महान योद्धाओं को भी अस्त्र-शस्त्र और धनुर्विद्या का ज्ञान प्रदान किया था।
शत्रु बाधा से मुक्ति और राष्ट्र कल्याण का दिया गया संदेश
आचार्यों ने अपने प्रवचन के दौरान बताया कि भगवान परशुराम की सच्चे मन से आराधना करने पर मानव को हर प्रकार की शत्रु बाधा और जीवन की नकारात्मक शक्तियों से मुक्ति मिल जाती है। इस पावन अवसर पर यह महत्वपूर्ण संदेश दिया गया कि प्रत्येक मानव मात्र को ईश्वर की पूर्ण शरणागति स्वीकार करनी चाहिए। व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर हर व्यक्ति को अपने समाज, गांव, राज्य और राष्ट्र के कल्याण के लिए निस्वार्थ भाव से कार्य करना चाहिए, यही भगवान परशुराम के जीवन का वास्तविक संदेश है।
महाप्रसाद का वितरण और कार्यक्रम में प्रमुख आचार्यों की उपस्थिति
पूजन, आरती और प्रवचन का कार्यक्रम संपन्न होने के बाद, वहां उपस्थित सभी भक्तों और श्रद्धालुओं के बीच महाप्रसाद का वितरण किया गया। परशुराम जन्मोत्सव के इस भव्य और सफल आयोजन में शहर के कई प्रमुख आचार्यों का महत्वपूर्ण योगदान रहा। इस जन्मोत्सव कार्यक्रम में मुख्य रूप से मुन्ना पांडेय, ध्रुव उपाध्याय, रमेश पांडेय, अशोक कुमार झा, अमित शर्मा, रवि जोशी, दीपक जोशी, नंदलाल पांडेय, कुमोद कुमार झा, अनूप मिश्रा, नितिन झा, सर्वेश पांडेय सहित कई अन्य आचार्यगण सक्रिय रूप से उपस्थित थे।






