जमशेदपुर । बिष्टुपुर थाना क्षेत्र में हाल ही में घटी एक अमानवीय घटना ने पूरे शहर को झकझोर कर रख दिया है. दबंगों द्वारा एक युवती पर खौलता हुआ ज्वलनशील पदार्थ (गर्म चाय) फेंकने के मामले में अब एक नया और गंभीर विवाद खड़ा हो गया है. पीड़िता मेंहदी, जो इस जानलेवा हमले में बुरी तरह झुलस गई है और वर्तमान में शहर के प्रतिष्ठित टाटा मेन हॉस्पिटल (टीएमएच) में जिंदगी और मौत की जंग लड़ रही है, उसके परिजनों से अस्पताल प्रबंधन द्वारा इलाज के नाम पर पैसों की मांग की जा रही है. इस अमानवीय और गैरकानूनी कृत्य के खिलाफ शहर के वरिष्ठ अधिवक्ता सुधीर कुमार पप्पू ने कड़ा ऐतराज जताते हुए एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की है.
दबंगों का कहर और अस्पताल की असंवेदनशीलता
बिष्टुपुर थाना अंतर्गत हुई इस खौफनाक घटना में दबंगों ने आपसी रंजिश या वर्चस्व को लेकर पीड़िता मेंहदी पर खौलती हुई चाय फेंक दी थी. इस हमले में उसका चेहरा और शरीर के अन्य हिस्से बुरी तरह से झुलस गए हैं. उसे गंभीर स्थिति में टीएमएच (TMH) में भर्ती कराया गया है. जहां एक तरफ पीड़िता का परिवार पहले ही गहरे सदमे और मानसिक पीड़ा से गुजर रहा है, वहीं दूसरी तरफ अस्पताल प्रबंधन द्वारा इलाज के एवज में भारी-भरकम बिल थमाकर रुपयों की मांग की जा रही है, जिसने इस मामले को और भी ज्यादा संवेदनशील बना दिया है.
कानून का उल्लंघन: अधिवक्ता सुधीर कुमार पप्पू का कड़ा रुख
इस मामले को लेकर वरिष्ठ अधिवक्ता सुधीर कुमार पप्पू ने स्पष्ट किया है कि टाटा मेन हाॅस्पीटल प्रबंधन का इस तरह की घटना में इलाज के लिए पैसा मांगना पूरी तरह से गैरकानूनी और अमानवीय है. उन्होंने बताया कि बिष्टुपुर थाने में आरोपियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 की धारा 118(2), 109, 352, 351(2), 74, और 3(5) के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है. यह एक गंभीर आपराधिक मामला है जिसमें ज्वलनशील पदार्थ फेंकने से शरीर और चेहरे पर विकृति आई है.
क्या कहता है नया और पुराना कानून?
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कानूनी प्रावधानों का हवाला देते हुए अधिवक्ता ने बताया कि ऐसे मामलों में कानून बेहद सख्त और स्पष्ट है. भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) 2023 की धारा 397 और 357C भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता के तहत यह स्पष्ट रूप से अनिवार्य किया गया है कि एसिड अटैक या किसी भी ज्वलनशील पदार्थ से झुलसने वाले पीड़ितों का इलाज (चाहे वह प्राथमिक उपचार हो या विशेष चिकित्सा) किसी भी सरकारी या निजी अस्पताल (जैसे टीएमएच) में पूरी तरह से मुफ्त होना चाहिए. प्राइवेट अस्पतालों को ऐसे मामलों में तुरंत और बिना किसी शुल्क के चिकित्सा सुविधा उपलब्ध करानी होती है.
उपायुक्त से त्वरित संज्ञान लेने की अपील
कानून के इस स्पष्ट प्रावधान के बावजूद, एक निजी अस्पताल द्वारा गरीब और पीड़ित परिवार से पैसों का दबाव बनाना न्याय की मूल भावना के खिलाफ है. अधिवक्ता सुधीर कुमार पप्पू ने जिले के उपायुक्त (DC) से इस पूरे मामले में तुरंत और सख्त संज्ञान लेने की अपील की है. उन्होंने प्रशासन से मांग की है कि वह टीएमएच प्रबंधन को निर्देशित करे कि कानून का पालन करते हुए पीड़िता मेंहदी का पूरा इलाज मुफ्त में किया जाए और परिवार को किसी भी तरह से परेशान न किया जाए. यह मामला अब केवल एक आपराधिक घटना नहीं रह गया है, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था की जवाबदेही और कानूनी अधिकारों के पालन का भी एक बड़ा सवाल बन गया है.





