
जमशेदपुर। सीएसआईआर-राष्ट्रीय धातुकर्म प्रयोगशाला (एनएमएल), जमशेदपुर में 1 जून 2026 से मास्टर ट्रेनर्स के लिए ई-कचरा रिसाइक्लिंग पर एक सप्ताह का विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू हुआ है। इस महत्वाकांक्षी पहल का मुख्य उद्देश्य ई-कचरा रिसाइक्लिंग से जुड़े असंगठित क्षेत्र के कामगारों को जागरूक कर उन्हें संगठित क्षेत्र की मुख्यधारा से जोड़ना है। कार्यक्रम की शुरुआत सीएसआईआर-एनएमएल के निदेशक डॉ. संदीप घोष चौधरी, मुख्य वैज्ञानिक डॉ. मनीष कुमार झा, डॉ. संजय कुमार और डॉ. एस. के. पाल की उपस्थिति में हुई।

असंगठित क्षेत्र को मिलेगा तकनीकी ज्ञान
इस विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम में TERI और REKART के मास्टर ट्रेनर्स की टीम शामिल हुई, जिनमें अलक डेका, अंकित कुमार रथ, जॉर्ज मैथ्यू, नीलिमा टी, श्वेता गौतम, रविकिरण शेट, सत्यम नेहरा, शंकर ठाकुर, अंशिका गुप्ता, लखन सिंह, रमन कुमार और रोहित गर्ग मौजूद रहे। प्रशिक्षण के दौरान मोबाइल, कंप्यूटर, टीवी, बैटरी और प्रिंटेड सर्किट बोर्ड (PCB) जैसे उपकरणों से निकलने वाले ई-कचरे को सुरक्षित और वैज्ञानिक तरीके से छांटने और रिसाइकल करने पर जोर दिया जा रहा है।
मुख्य वैज्ञानिक डॉ. मनीष कुमार झा के नेतृत्व में वैज्ञानिकों की टीम यह सिखाएगी कि कैसे ई-कचरे से कॉपर, एल्युमिनियम और गोल्ड जैसी कीमती धातुओं को सुरक्षित तरीके से निकाला जा सकता है। कामगारों को खुले में ई-कचरा जलाने और रसायनों के अनियंत्रित उपयोग से स्वास्थ्य और पर्यावरण को होने वाले गंभीर नुकसान के बारे में भी जागरूक किया जाएगा।
सर्कुलर इकोनॉमी और ईको-पार्क का निर्माण
यह पूरा कार्यक्रम भारत सरकार के इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा प्रायोजित है, जिसे सी-मेट (हैदराबाद), सीएसआईआर-एनएमएल (जमशेदपुर) और सीआईपीईटी-एलएआरपीएम (भुवनेश्वर) के संयुक्त उपक्रम के तहत चलाया जा रहा है। इसका लक्ष्य असंगठित कामगारों को स्वदेशी तकनीक की मदद से एमएसएमई क्लस्टर (MSME Cluster) और ईको-पार्क स्थापित करने में मदद करना है। प्रतिदिन 100 से 300 किलोग्राम पीसीबी प्रोसेस कर कॉपर, सिल्वर और गोल्ड निकालने की उन्नत तकनीक पर काम होगा। इससे देश में ‘सर्कुलर इकोनॉमी’ और संसाधन दक्षता को बढ़ावा मिलेगा।
15 हजार कामगारों को मिलेगा रोजगार और सुरक्षा
क्षमता निर्माण के तहत इस परियोजना का लक्ष्य देशभर में 300 कार्यशालाएं आयोजित कर 15,000 असंगठित कामगारों को प्रशिक्षित करना है। इसके अलावा 75 असंगठित क्लस्टरों की पहचान कर उनमें से 30 को एमएसएमई यूनिट के रूप में संगठित रूप दिया जाएगा। भारत में ई-कचरा रिसाइक्लिंग में असंगठित क्षेत्र की बड़ी भूमिका है, ऐसे में उन्हें माइक्रो-उद्यमी बनाकर न केवल उनकी आजीविका सुरक्षित की जाएगी, बल्कि पर्यावरण को भी बड़े नुकसान से बचाया जा सकेगा।



