
जमशेदपुर.


अधिवक्ता सुधीर कुमार पप्पू ने विदेश मंत्रालय एवं क्षेत्रीय पासपोर्ट कार्यालय को पत्र लिखकर कोविड-19 दिशा-निर्देशों के मामूली उल्लंघन के मामलों के आधार पर छात्रों व आम नागरिकों के पासपोर्ट अस्वीकृत किए जाने की प्रक्रिया पर गंभीर आपत्ति जताई है. उन्होंने कहा है कि पुलिस वेरिफिकेशन के दौरान केवल लॉकडाउन, मास्क अथवा आवाजाही प्रतिबंध जैसी छोटी घटनाओं के चलते पासपोर्ट आवेदन खारिज किए जा रहे हैं, जबकि इनमें किसी प्रकार की आपराधिक मंशा का तत्व नही है.
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अधिवक्ता पप्पू ने अपने पत्र में उल्लेख किया है कि महामारी के दौरान दर्ज ऐसे मामले पूर्णतः ‘नियामक प्रकृति’ (regulatory offences) के थे, विशेष परिस्थितियों में घटित हुए और कई मामलों में जुर्माना भरकर निपट चुके हैं. इसके बावजूद पासपोर्ट अधिनियम, 1967 की धारा 5(2)(e) का यांत्रिक रूप से प्रयोग किया जा रहा है, जबकि किसी सक्षम अदालत ने विदेश यात्रा पर रोक नहीं लगाई है.
उन्होंने अपने अभ्यावेदन में माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय Mahesh Kumar Agarwal v. Union of India & Anr. (2025 INSC 1476) का हवाला देते हुए कहा कि केवल आपराधिक कार्यवाही लंबित होने के आधार पर पासपोर्ट जारी करने से इनकार नहीं किया जा सकता. सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि विदेश यात्रा से जुड़ा निर्णय न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र में आता है और पासपोर्ट प्राधिकारी अनुमान या आशंकाओं के आधार पर नागरिकों के अधिकार सीमित नहीं कर सकते. अधिवक्ता के अनुसार, यही सिद्धांत धारा 5(2)(e) के अंतर्गत आने वाले मामलों पर भी समान रूप से लागू होते हैं.
पप्पू ने कहा कि इस वजह से छात्रों का शैक्षणिक भविष्य प्रभावित हो रहा है तथा आम नागरिक रोजगार, चिकित्सा, व्यवसाय और पारिवारिक कारणों से विदेश यात्रा करने से वंचित हो रहे हैं.
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उन्होंने मांग की है कि कोविड-19 के छोटे व तकनीकी उल्लंघनों को पासपोर्ट के रास्ते में स्वतः बाधा न माना जाए, पुलिस प्रतिकूल रिपोर्ट न दे और पासपोर्ट प्राधिकारी केवल यह देखें कि क्या अदालत ने स्पष्ट रूप से विदेश यात्रा पर प्रतिबंध लगाया है या नहीं.
उन्होंने आशा व्यक्त की है कि विदेश मंत्रालय इस विषय पर स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी कर नागरिकों को कठिनाइयों से राहत देगा.



