
जमशेदपुर।
राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू का एक वीडियो इन दिनों सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें वे कार्यक्रम के दौरान गाती हुई नजर आ रही हैं। पहली नजर में कई लोग इसे गीत समझ रहे हैं, लेकिन वास्तव में यह कोई फिल्मी या लोकगीत नहीं, बल्कि एक पारंपरिक वंदना है, जिसे राष्ट्रपति ने पूरे श्रद्धा भाव के साथ प्रस्तुत किया।

वायरल वीडियो की सच्चाई
यह वंदना झारखंड के जमशेदपुर स्थित दिशोम जाहेर, करनडीह में आयोजित एक भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रम के दौरान गाई गई थी। यह अवसर था 22वें संताली ‘परसी महा’ एवं ओलचिकी लिपि के शताब्दी वर्ष समापन समारोह का। इस ऐतिहासिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने स्वयं वंदना गाकर आदिवासी संस्कृति और परंपराओं के प्रति अपना सम्मान व्यक्त किया।
पावन माहौल में गूंजा सांस्कृतिक स्वर
कार्यक्रम के दौरान पूरा वातावरण अत्यंत पावन और भावनात्मक हो गया, जब राष्ट्रपति ने श्रद्धा भाव से वंदना का उच्चारण किया। मंच पर राष्ट्रपति का यह रूप देखकर उपस्थित लोग भावुक हो उठे। वंदना के शब्दों में आस्था, प्रकृति और संस्कृति से जुड़ी भावना स्पष्ट रूप से झलक रही थी।
राष्ट्रपति ने खुद साझा किया हिंदी रूपांतरण
इस पूरे घटनाक्रम की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने इस वंदना का हिंदी रूपांतरण स्वयं अपने आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट पर साझा किया। उन्होंने स्पष्ट रूप से लिखा कि यह कोई गीत नहीं, बल्कि पारंपरिक वंदना है, जिसे उन्होंने सम्मान और आस्था के साथ प्रस्तुत किया है।
President Droupadi Murmu recited a prayer of Santhal community expressing reverence to 'Jaher-Ma' at the closing ceremony of Parsi Maha and centenary celebrations of Ol Chiki at Jamshedpur.
President Droupadi Murmu said that the Santhali literature gains strength through oral… pic.twitter.com/beL7Bn62ZK
— President of India (@rashtrapatibhvn) December 29, 2025
संस्कृति से जुड़ाव की मिसाल
राष्ट्रपति की यह पहल उनके सरल स्वभाव और सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहने का परिचय देती है। एक आदिवासी पृष्ठभूमि से आने वाली राष्ट्रपति का इस तरह अपनी भाषा, लिपि और परंपरा को राष्ट्रीय मंच पर प्रस्तुत करना लोगों के लिए प्रेरणादायक बन गया है।
सोशल मीडिया पर मिल रही सराहना
वायरल वीडियो पर सोशल मीडिया यूजर्स राष्ट्रपति की सादगी, संस्कृति प्रेम और विनम्रता की जमकर सराहना कर रहे हैं। लोग इसे भारत की विविध संस्कृति और आदिवासी पहचान के सम्मान के रूप में देख रहे हैं।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की यह वंदना केवल एक प्रस्तुति नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विरासत और आदिवासी समाज के गौरव का प्रतीक बन गई है।

