
*ब्रह्म संप्राप्ति ही मनुष्य के जीवन का लक्ष्य है*


*शरीर रूपी रथ को चलाने के प्रकृत विज्ञान को ब्रह्म विज्ञान कहते हैं।*
जमशेदपुर
गदरा आनंद मार्ग प्रचारक संघ द्वारा आयोजित त्रिदिवसीय प्रथम संभागीय सेमिनार के अंतिम दिन 7 फरवरी को आनन्द मार्ग जागृति प्रांगण में साधक- साधिकाओं ने अष्टाक्षरी सिद्ध महामंत्र “बाबा नाम केवलम् “कीर्तन का गायन कर वातावरण को मधुमय बना दिया।*
शिविर में उपस्थित आनंदमार्गियों को संबोधित करते हुये केन्द्रीय प्रशिक्षक आचार्य स्वरूपानंद अवधूत ने मानवीय अस्तित्व की तुलना रथ और रथी से करते हुए कहा कि रथ की तरह ही शरीर एक जैविक यंत्र है । *शरीर रूपी रथ का यात्री आत्मा है,* विवेक सारथी है, मन लगाम है, इंद्रियां अश्व है। विवेक हीन सारथी इसे संसारालय की झाड़ झंकार की ओर ले कर चला जाता है और विवेकवान इसे देवालय की ओर ले चला जाता है । इस देह रूपी रथ से नकारात्मक और सकारात्मक दोनों दिशाओं में यात्रा की जाती है।
*शरीर रूपी रथ को चलाने के प्रकृत विज्ञान को ब्रह्म विज्ञान कहते हैं।* जिस व्यक्ति की विवेक बुद्धि जग पड़ी है, जिसकी विचार शक्ति उदग्र हुई है ,उसका मन हमेशा बुद्धि के साथ युक्त रहता है अर्थात् मनरूपी लगाम सर्वदा ही विवेक रुपी सारथी के द्वारा नियंत्रित रहता है ।स्वाभाविक नियमानुसार उसका इंद्रिय समूह रूपी अश्व बुद्धि के वशीभूत हो पड़ता है। आध्यात्मिक साधना का अनुशीलनात्मक ज्ञान से ही यह सब संभव है। अष्टांग योग के यम, नियम, आसन प्राणायाम के द्वारा इंद्रियों पर नियंत्रण हो जाता है। प्रत्याहार ,धारणा ध्यान और समाधि के द्वारा मन तथा बुद्धि का नियंत्रण संभव है। *ब्रह्म संप्राप्ति ही मनुष्य के जीवन का लक्ष्य है।* वही हम सबों का गंतव्य स्थल है।

