दुमका
सिद्धू कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय (एसकेएमयू), दुमका के सभागार में सोमवार को कवि, लेखक और शिक्षक विक्रम कुमार की पुस्तक ‘कैक्टस’ का भव्य लोकार्पण समारोह आयोजित किया गया।
विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. डॉ. कुनुल कंदीर ने बतौर मुख्य अतिथि पुस्तक का विमोचन करते हुए इसे ‘मनुष्य की संघर्षशील भावना और जिजीविषा का प्रतीक’ बताया। उन्होंने कहा कि यह रचना अपने शीर्षक के अनुरूप फूल और कांटे दोनों को दर्शाती है, जो मानव जीवन के संघर्ष को व्यक्त करते हैं। कुलपति ने यह भी कहा कि ‘कैक्टस’ दो पीढ़ियों के अनुभवों को समाहित करता है और नई पीढ़ी को संवेदनशीलता व संस्कार की दिशा दिखाने में सहायक होगा ।समारोह में गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति लोकार्पण समारोह में विश्वविद्यालय के कई वरिष्ठ अधिकारी और शहर के प्रतिष्ठित साहित्यकार उपस्थित रहे। कार्यक्रम में कुलसचिव राजीव रंजन शर्मा, प्रॉक्टर डॉ. राजीव कुमार, डीएसडब्ल्यू जैनेंद्र यादव, सीसीडीसी डॉ. अब्दुस सत्तार, वित्त पदाधिकारी संजय सिन्हा, और आइक्यूएसी कोऑर्डिनेटर डॉ. निलेश कुमार प्रमुख थे। समारोह का संचालन अशोक सिंह ने किया।
लेखकीय अनुभव और साहित्यिक चर्चा
लेखक विक्रम कुमार ने अपने वक्तव्य में पाठकों के साथ अपनी लेखन यात्रा से जुड़े प्रेरणादायक अनुभव साझा किए। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहीं पूर्व प्रतिकुलपति डॉ. प्रमोदिनी हासदा ने विक्रम कुमार के साहित्यिक योगदान की प्रशंसा करते हुए कहा कि उन्होंने निरंतर साहित्य साधना से दुमका की साहित्यिक परंपरा को समृद्ध किया है।
पुस्तक चर्चा के दूसरे सत्र में डॉ. चतुर्भुज नारायण मिश्र, शंभूनाथ मिस्त्री, अरुण सिन्हा, डॉ. यू.एस. आनंद, डॉ. विनय कुमार सिंह, डॉ. संजीव कुमार, प्रो. राजेश प्रसाद, परिमल कुंदन, पवन मिश्रा, अंजनी शरण, रेखा साव, हरिदर्शन पांडे, संतोष कुमार, कविता कुमारी और डॉ. विवेक कुमार सहित कई प्रख्यात साहित्यकारों ने रचनात्मक विमर्श किया और पुस्तक की विषयवस्तु पर अपने विचार रखे।
‘कैक्टस’ एक सारगर्भित संग्रह
मीनाक्षी प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित ‘कैक्टस’ में कवि विक्रम कुमार की चुनिंदा कविताएं और लघुकथाएं संग्रहित हैं। इस पुस्तक की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि लेखक ने इसमें अपने पिता, वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. यू.एस. आनंद की कुछ महत्वपूर्ण रचनाओं को भी शामिल किया है, जिससे यह संग्रह पाठकों के लिए और भी अधिक सारगर्भित और पठनीय बन गया है। लोकार्पण समारोह का धन्यवाद ज्ञापन वरिष्ठ साहित्यकार अरुण सिन्हा द्वारा किया गया।
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पुस्तक ‘कैक्टस’ पर साहित्यिक विमर्श
लोकार्पण समारोह के दूसरे सत्र में आयोजित संगोष्ठी में हिंदी विभाग के प्राध्यापकों और वरिष्ठ साहित्यकारों ने पुस्तक कैक्टस पर अपने विचार व्यक्त किए। वक्ताओं ने इसे नई पीढ़ी की जिजीविषा, संवेदनशीलता और आत्ममंथन का प्रतीक बताया।चतुर्भुज नारायण मिश्र ने कहा कि पुस्तक समाज और साहित्य को जोड़ने का माध्यम है। आज हिंदी संक्रमण काल से गुजर रही है, ऐसे में कैक्टस जैसी पुस्तकें सकारात्मक संकेत देती हैं।प्रोफेसर राजेश प्रसाद ने कहा कि कैक्टस को हम जिजीविषा के रूप में देख सकते हैं। इसमें कांटे भी हैं और फूल भी। शंभू नाथ मिस्त्री ने कहा कि यह सुखद है कि पुरानी पीढ़ी के बाद अब नई पीढ़ी साहित्य लेखन में आगे आ रही है। डा प्रमोदिनी हांसदा ने कहा कि विक्रम कुमार का पूरा परिवार अपनी लेखनी से साहित्य सेवा कर रहा है। उन्होंने दुमका के पूर्व उपायुक्त अंजनी कुमार सिंह से जुड़ी यादें साझा करते हुए कहा कि जहां कांटे हैं, वहीं फूल भी खिलते हैं ।पवन मिश्र ने भी कैक्टस के कथ्य और प्रतीकात्मकता पर अपने विचार रखे। वहीं इतिहास विभागाध्यक्ष डॉ संजीव कुमार ने कहा कि कैक्टस सृजनात्मक समाज के लिए लाभकारी है ।


