
चाईबासा: झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व केंद्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा ने चाईबासा (पश्चिमी सिंहभूम) जिला प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। सोशल मीडिया पर एक पोस्ट साझा करते हुए उन्होंने प्रशासन पर प्रोटोकॉल, सामान्य शिष्टाचार और आवश्यक औपचारिकताओं के निर्वहन में पूरी तरह से विफल रहने का आरोप लगाया है। उनका यह बयान राज्य के राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है।
चाईबासा परिसदन में प्रशासन की घोर अनदेखी
अर्जुन मुंडा ने बताया कि पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के तहत उनका चाईबासा परिसदन (सर्किट हाउस) में रात्रि विश्राम हुआ था। उन्होंने कड़े शब्दों में कहा कि यह अत्यंत खेद और चिंता का विषय है कि चाईबासा जिला प्रशासन द्वारा उनके आगमन पर सामान्य शिष्टाचार का भी पालन नहीं किया गया। उन्होंने स्पष्ट किया कि यद्यपि वे वर्तमान में विधायक, सांसद या मंत्री नहीं हैं, लेकिन वे झारखंड के मुख्यमंत्री और भारत सरकार में मंत्री जैसे उच्च संवैधानिक पदों पर रह चुके हैं, जिसका सम्मान प्रशासन को करना चाहिए था।
प्रशासनिक अकड़ और अनुभव की भारी कमी
पूर्व मुख्यमंत्री ने प्रशासन के इस रवैये को प्रशासनिक शिष्टाचार और अनुभव की कमी करार दिया। उन्होंने तीखा प्रहार करते हुए कहा कि यह स्थिति या तो ‘प्रशासनिक अकड़’ को दर्शाती है, या फिर राज्य सरकार के लोकतांत्रिक मूल्यों और सामान्य सामाजिक मर्यादाओं के प्रति गहरी उदासीनता को प्रकट करती है। उन्होंने कहा कि ऐसा व्यवहार किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए उचित नहीं है।
संवाद और संवेदनशीलता की पुरानी परंपरा हुई खत्म
अर्जुन मुंडा ने पुरानी प्रशासनिक व्यवस्थाओं को याद करते हुए कहा कि पहले एक स्वस्थ और सुदृढ़ परंपरा थी। जब भी सार्वजनिक जीवन से जुड़ा कोई व्यक्ति जिले में आता था, तो प्रशासन उनके साथ जिले की परिस्थितियों, विकास कार्यों और जन सरोकारों पर संवाद स्थापित करता था। यह केवल औपचारिकता नहीं थी, बल्कि इससे प्रशासन की सकारात्मक कार्यसंस्कृति, संवेदनशीलता और जिले की गरिमा झलकती थी।
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राजनीतिक भिन्नताओं से ऊपर उठने की दी नसीहत
पश्चिमी सिंहभूम को एक ऐतिहासिक और जनजातीय बहुल जिला बताते हुए अर्जुन मुंडा ने कहा कि इस जिले की अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान है। ऐसे महत्वपूर्ण जिले में प्रशासन का इस प्रकार का व्यवहार निश्चित रूप से गंभीर चिंतन का विषय है। उन्होंने प्रशासन को नसीहत दी कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रशासन से यह अपेक्षा की जाती है कि वह राजनीतिक भिन्नताओं से ऊपर उठकर काम करे। संवैधानिक मर्यादाओं, प्रशासनिक शिष्टाचार और सामाजिक सौजन्यता का समुचित पालन सुनिश्चित करना प्रशासन का पहला दायित्व होना चाहिए।



