
कौशल और सरला जमशेदपुर की कविता धारा के नीब की ईंट – शांति सुमन


जमशेदपुर: कविवर गंगाप्रसाद कौशल और कवयित्री सरला कैशल जमशेदपुर शहर की कविता धारा के नीब की ईंट हैं। नीब की ईंट जितनी मजबूत होती हैं। उसके कंगूरे उतने ज्यादा दिखाई देते हैं। इसी कारण इस शहर की कविता धारा बहुत ही समृद्ध है। यह उद्गार बिहार व झारखंड की प्रसिद्ध कवयित्री डाक्टर शांति ‘सुमन’ ने ‘कौशल-सरला कविता प्रतियोगिता’ के पुरस्कार वितरण समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि अगर कविवर गंगाप्रसाद ‘कौशल’ और सरला नहीं होतीं व उन्होंने नीब की मजबूत ईंट नहीं बनाई होती तो क्या हम इतनी ऊँचाई पर पहुँच पाते? डाक्टर शांति ‘सुमन’ ने कहा कि कौशल जी की कविताएँ निम्न मध्यम वर्ग के लिए हैं। इसी वर्ग के लोग देश की स्वतंत्रता के आन्दोलन में किसी से पीछे नहीं थे। उन्होंने कहा कि मज़दूर हमारे हाथ, पाॅव, पीठ, पेट हैं यदि उन्हें हम छोड़ कर चलेंगे तो हमारी कविता पंगू हो जाएगी।
कवयित्री सरला कौशल के बारे में उन्होंने कहा कि जिस समय में स्त्रियों का पढ़ना लिखना ही मुश्किल था वैसे समय कैसे उनकी हृदय की संवेदनाओं ने शब्द को अपना संसार बना लिया? घर का काम-काज करते हुए उन्होंने कविता लिखने का समय निकाल लिया, उनके प्रति दिल में बहुत श्रद्धा होती है।
शहर के वरिष्ठ साहित्यकार डाक्टर बच्चन पाठक ‘सलिल’ ने मुख्य वक्ता के रूप में इस मौके पर कविवर कौशल के संस्मरणों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उन्होंने नई पीढ़ी तथा परिपक्व लोगों की कविताएँ छाप कर उन्हें प्रोत्साहित किया, जो लोग बाद में बहुत चर्चित हुए। डाक्टर सलिल ने कहा कि आज़ाद मज़दूर के 10 पृष्ठों में 2 पृष्ठ साहित्य के लिए समर्पित था। आज कल 24-30 पृष्ठों के समाचार पत्रों में क्रिकेट है, हत्या है, सिनेमा है पर साहित्य नहीं है। आज के दैनिक समाचार पत्र समझते हैं कि साहित्य बेकर की चीज है इससे उनका बाजार नहीं बनेगा। डाक्टर सलिल ने कहा कि कौशल जी उस संस्कृति का निर्वाह करते थे जो मनुष्यता, मित्रता, परिचय को सही अर्थों मे रूपायत करती है, जबकि आज के लोग क्षणे रुष्टम, क्षणे दुष्टम हो गए हैं।
उन्होंने कहा कि सरल हृदय, दृढ़ हृदय, नई पीढ़ी को संस्कारित करने वाला, आगे बढ़ाने वाला, निर्भय और सहयोग करने वाला यदि कोई साहित्यकार हुआ तो उसका नाम गंगाप्रसाद कौशल है। कवयित्री सरला के बारे में उन्होंने कहा कि यदि सरला जी का साथ नहीं मिलता तो कौशल जी को इतनी सफलता नहीं मिलती।
अपने अध्यक्षीय भाषण में साहित्यकार श्री हरिबल्लभ सिंह ‘आरसी’ ने इस समारोह को पितृपक्ष के यज्ञ की संज्ञा देते हुए कहा कि अपने माता पिता को याद करना और उन्हें प्रणाम करने के लिए लोगों को बुलाना यह अनुकरणीय संस्कार है। उन्होंने कहा कि बच्चों द्वारा बूढ़े माता पिता को घर से निकाल देने का समाचार पढ़ कर रोना आ जाता है। वैसी स्थिति में ऐसे पुत्ररत्न बहुत कम जन्म लेते हैं, जो माता पिता को याद करते हैं। यही असल पितृपक्ष है, बाह्मणों को जाकर दक्षिणा देना निरर्थक है।कविता प्रतियोगिता के मुख्य निर्णायक कवि जीपी अरुण ने नवोदित कवियों और कवयित्रियों को जरूरी निदेश दिए।
डाक्टर शांति सुमन ने कविता प्रतियोगिता में प्रथम स्थान पाने वाली ऋितुपर्णा गौतमी को 5 हजार रुपए का चेक प्रदान किया। द्वितीय पुरस्कार पाने वालीं जूही झा तथा आरती शर्मा को डेढ़-डेढ़ हजार रुपए के चेक दिए गए। तृतीय पुरस्कार पाने वाले अमित कुमार साव व सुरभि मिश्रा को एक-एक हजार रुपए के चेक दिए गए। इसके अलावे 17 प्रतियोगियों को प्रोत्साहन पुरस्कार प्रदान किए गए। कार्यक्रम का संचालन अशोक शुभदर्शी तथा स्वागत भाषण फ्लैक के अध्यक्ष पे्रमचन्द्र ने किया।
समारोह के बाद डाक्टर कल्याणी कबीर के सफल संचालन में कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। इसमें शहर के जानेमाने कवियों ने श्रोताओं को झुमा दिया। इन कवियों में डा0 शांति सुमन, श्री सदानंद सुमन, नंद कुमार उन्मन, गीता मुदलियार नूर, अनिता शर्मा, राम निवास, आनंदबाला शर्मा, श्यामल सुमन, धर्म चन्द्र पोद्दार, अशोक शुभदर्शी, शैलेन्द्र कुमार पाण्डेय शैल, प्रेम चंद्र, उदय प्रताप हयात, नौशाद रजिया, चन्द्रशेखर, जूही झा आदि मुख्य थे।
फोटो: 1, प्रथम पुरस्कार देतीं मुख्य अतिथि शांति सुमन
2, सभी प्रतियोगियों के साथ

