जमशेदपुर,।
टाटास्टील अपनी शुरुआत से ही अपने कार्य क्षेत्र एवं आसपास के इलाकों में रहनेवाले जनजातीय समुदायों के कल्याण एवं विकास हेतु निरंतर प्रयासरत रही है। स्थानीय समुदाय के कल्याण के प्रति अपनी इस प्रतिबद्धता को जारी रखते हुए टाटास्टील ‘संवाद- एक जनजातीय सम्मेलन’ का आयोजन कर रही है। इस सम्मेलन का आयोजन टाटास्टील की सामाजिक संस्था ट्राईबल कल्चरल सोसायटी द्वारा किया जा रहा है। इस संस्थाने आदिवासी समुदायों के कल्याण एवं जनजातीय संस्कृतिक विरासत के संरक्षण एवं संवर्द्धन के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान किया है।
संवाद सम्मेलन के दूसरे दिन ‘चिंतन’ सभागार में प्रख्यात विशेषज्ञों के पैनेल ने ‘विलुप्त होतीं जनजातीय भाषाएँ’ विषय पर गहन विचार-विमर्श किया।इस विचार-विमर्श में पूरे भारत से आये जाने-माने शिक्षा विदों, चिंतकों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं ने पूरे उत्साह के साथ भागीदारी की। प्रथम सत्र का संचालन लोककथा विशेषज्ञ एवं फिनिश महाकाव्य का लेवला का अनुवाद करने हेतु 2001 में कालेवला इंस्टीच्यूट द्वारा पुरस्कृत डॉ. महेन्द्र कुमार मिश्र ने किया।अपने संबोधन में श्री कुमार ने कहा, ‘’जनजातीय भाषाओं के संवर्द्धन हेतु एक विशेष अभियान बड़े पैमाने पर शुरू करना आवश्यक है।हमें आदिवासी समुदाय के बुजुर्ग पुरुषों एवं महिलाओं से काफी कुछ सीखने की जरूरत है, क्योंकि यह माना जाता है कि एक बुजुर्ग की मृत्यु एक पूरा पुस्तकालय नष्ट होने के समान है।.’’
देशभर की विभिन्न जनजातीय भाषाओं के बारे में कुछ चौंकाने वाले तथ्यों का खुलासा करते हुए प्रोफेसर कांजी पटेल, प्रभारी प्राचार्य, आर्ट कॉलेज, लुमावदा ने कहा, “देशमेंकुल 780 भाषाएँ अस्तित्व में हैं।इनमें से 200 से भीज्यादाजनजातीय भाषाएँ शामिल हैं।“उन्होंनेकहा, “भाषाओं के दस्तावेजी करण एवं सर्वेक्षण की परियोजना लंबे समयसेचलरही है।कई भाषाओं को मान्यता मिलना अब भी शेष है।”
डॉ. मदन मीना, विजुअल आर्टिस्ट एवं शोधकर्ता, राजस्थान ने कहा,“कुछ अरसा पहले तक राजस्थान में कई ऐसे समुदाय थे जो अपने घरों की दीवारों को कलाकृतियों से सुसज्जित करते थे।आज यह परंपरा मिटती जा रही हैऔर इसके साथ ही चित्रों की भाषा भी विलुप्त होती जा रही है।”
इस मौके पर अपने संबोधन मेंपद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित मशहूर साहित्य समीक्षक एवं भाषा रिसर्च ऐंड पब्लिकेशन सेंटर, वड़ोदरा के संस्थापक निदेशक श्री गणेश देवी ने कहा, “पूरी दुनिया में 6,000 भाषाएँ आज भी जिंदा हैं।पर यूनेस्को के आकलन के अनुसार अगले 40 वर्षों में तकरीबन 4,000 भाषाएँ विलुप्त हो चुकी होंगी।जिस गति से हम अपनी भाषाएँ खो रहे हैंवह सचमुच दुखद एवं विस्मयकारी है।”
इस जनजातीय सम्मेलन में अंडमान एवं निकोबार, आंध्रप्रदेश, अरुणाचलप्रदेश, असम, छत्तीसगढ़, गुजरात, जम्मू-कश्मीर, झारखंड, कर्नाटक, केरल, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नगालैंड, उड़ीसा, तमिलनाडु एवं त्रिपुरा समेत देश के 25 राज्यों की 40 सेअधिक विभिन्न जनजातियों से ताल्लुक रखने वाले 1500 से भी ज्यादा आदिवासी कलाकार, विचारक, प्रख्यात हस्तियाँ और सामाजिक कार्यकर्ता भाग ले रहे हैं और अपने-अपने विचारों, कलाओं एवं हुनर का आदान-प्रदान कर रहे हैं।


