World Mental Health Day:तन ही नहीं मन भी होता है बीमार, मन के भी घाव का रखना होगा ध्यान –अजिताभ गौतम

विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस पर विशेष तन ही नहीं मन भी होता है बीमार, मन के भी घाव का रखना होगा ध्यान --अजिताभ गौतम 

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जमशेदपुर।

तन बीमार होता है तो लोग बड़े शान से डाॅक्टर को दिखाने जाते हैं लेकिन मन के बीमार होने पर उसे छुपाने की कोशिश होती है.ऐसा माहौल समाज में बना हुआ है कि मानो शरीर को बीमार होने का हक है लेकिन मन को नहीं..जबकि सचाई है कि आज की भागदौड और तनाव भरी जिंदगी में डिप्रेशन और अन्य कई समस्याएं विकराल रुप धारण कर रही हैं.जमशेदपुर की बात करें तो आए दिन यहां आत्महत्या की खबरें भरी रहती हैं.किसी किसी दिन तो तीन चार आत्महत्याएं तक की खबरें नजर आती हैं.जाहिर है कि यह खतरे की घंटी है.

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कलंक जुडा है मानसिक रोग के साथ

तन के साथ साथ मन भी बीमार पडता है लेकिन मानसिक रोगों के साथ एक स्टिगमा(कलंक/लांछन) जुड़ा हुआ है.यही वजह है कि लोग छुपाते हैं या छुप छुपकर इलाज करवाते हैं.छुपाने की वजह से समस्या बढती चली जाती है.हालांकि अब माहौल में काफी बदलाव आया है फिर भी बहुत काम करना बाकी है. कलंक जुड़े होने की वजह जागरूकता का अभाव है.कलंक की अवधारण की वजह से इंसान मदद मांगने में असमर्थ है जाता है और इलाज की चुनौतियां बढ जाती हैं जबकि यह सहज होना चाहिए.जैसे तन में समस्या आई, चोट लग गई, फ्रैक्चर हो गया या बुखार हो गया झट डाॅक्टर को दिखा लिया वैसे ही मन की तकलीफ पर सहजता से इंसान दिखाए पर दुखद है कि अब भी यह सहज नहीं है.

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मेंटल हेल्थ या मानसिक स्वास्थ्य से जुडी क्या समस्याएं हैं

मेंटल हेल्थ यानि मनोवैज्ञानिक तल पर आपका स्वास्थ्य कैसा है? कोई ट्राॅमा है, कोई घाव है, कोई दर्द है, कोई anxiety(घबराहट)है, अवसाद (depression) है, क्लिनिकल डिप्रेशन वगैरह है. मानसिक स्वास्थ्य के कंडीशन को दो भागों में बांटते हैं–न्यूरोटिक और साइकोटिक. न्यूरोटिक कंडीशन वाले सत्य या यथार्थ को तोड़ मरोड़कर प्रस्तुत करते हैं या फिर ग्रहण करते हैं.जैसे रस्सी को सांप समझ लेना..रस्सी है पर सच्चाई न देखकर उसे सांप समझ बैठना..इसके उदाहरण हैं–मूड डिस्ऑर्डर, एक्जाइटी(anxiety), eating disorder, panic disorder वगैरह वगैरह.

साइकाॅटिक कंडीशन में इंसान सच्चाई से नाता तोड़ लेता है. उदाहरण के तौर पर यहां कोई रस्सी नहीं फिर भी उसे सांप नजर आता है.स्रीजोफिनिया इसका एक उदाहरण है.

दोनों प्रकार की समस्याएं मिलकर मनोवैज्ञानिक समस्याएं बनती हैं.

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कैसे होता है इलाज

कई लोगों में इतनी अंतर्दृष्टि होती है कि उन्हें समझ आता है कि कुछ गडबड है और वे खुद साइकोलाॅजिकल काउंसिलर को एप्रोच करते हैं.वहीं कई लोगों की अवस्था इतनी खराब होती है कि वे समाज की मदद से पहुंच पाते हैं. अगर कंडीशन बहुत सीरियस हो तो तुरंत दवाइंया दी जाती हैं, जरुरत पडने पर इलेक्ट्रिक शाॅक थेरेपी भी प्रदान की जाती हैं. अलग अलग केस को अलग अलग ट्रीटमेंट दी जाती है.मरीज के एक खास तल पर आने के बाद थेरेपिक ट्रीटमेंट होता है.ओवर ऑल ट्रीटमेंट की जरुरत होती है क्योंकि हम सिर्फ तन नहीं बल्कि तन, मन, समाज और आत्मा हैं…

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जागरुकता बढेगी तब इलाज की चुनौतियां घटेगी

मानसिक रोगों को लेकर कई मिथ हैं जिसका कारण जागरुकता का अभाव है.जागरूकता की शुरुआत खुद से होती है, जितनी ही यह बात समझ आएगी कि मैं हूं–उतनी ही संवेदनशीलता बढेगी और जितनी संवेदनशीलता बढेगी उतना ही मेंटल और इमोशनल हेल्थ के प्रति संवेदनशीलता बढेगी.जागरुकता बढने पर हम किसी को जज नहीं करेंगे. गैर निर्णायक (नाॅन जजमेंटल) होकर ही हम किसी मानसिक रुप से अस्वस्थ व्यक्ति की मदद कर सकते हैं. इलाज की शुरुआत ही इसी से है–जज नहीं करने से–जब जज नहीं किया जाता है तो व्यक्ति खुलकर अपनी समस्या एं, दिल की बात, घाव, वेदना और तकलीफ साझा कर पाता है.समाधान की शुरुआत यहीं से होती है.

लेखक ‘ साइको शिरप’ के संस्थापक और साइकोलाॅजिकल का उंसिलर हैं.

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