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Home » Twisha Sharma case :ट्विशा शर्मा केस में मीडिया ने दिखाई अपनी ताकत, क्या पुलिस और सिस्टम के रवैये से उठ गया है जनता का भरोसा?
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Twisha Sharma case :ट्विशा शर्मा केस में मीडिया ने दिखाई अपनी ताकत, क्या पुलिस और सिस्टम के रवैये से उठ गया है जनता का भरोसा?

BJNN DeskBy BJNN DeskMay 25, 2026No Comments4 Mins Read
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अन्नी अमृता

ट्विशा शर्मा केस में मीडिया ने अपनी वह शक्ति दिखाई है, जिसे वह खुद पिछले कई सालों से भूल गई है. जब शक्ति याद आ जाए, तब क्या हो सकता है, यह दुनिया देख रही है. हालांकि इस हाई प्रोफाइल केस में आगे लड़ाई लंबी है, मगर जिस प्रकार से रसूखदार अपने संपर्क का इस्तेमाल कर एफ आई आर में लेट करवा रहे थे, जिस प्रकार से पुलिस का शुरूआती रवैया भेदभावपूर्ण रहा, वैसे समय में मीडिया ने जिस प्रकार अपना रोल उस समय से लेकर आज तक निभाया है और निभा रही है, ये उसी का परिणाम है कि देर से सही, पर आरोपी पति समर्थ जेल की सलाखों के भीतर है..जिसे आप मीडिया ट्रायल कहते हैं, वह कई मामलों में इंसाफ की लड़ाई होती है, जो ऐसे भ्रष्ट सिस्टम में जरुरी है, जहां न्याय पाना एक सपना हो चला है..

मीडिया और सोशल मीडिया का असर है कि अब सुप्रीम कोर्ट ने भी संज्ञान लिया है..मीडिया के प्रयास और ट्विशा के परिवार के हौसलों की दाद देनी होगी कि अनर्थ के आगे वे डटकर खड़े हैं और हाई कोर्ट ने दुबारा पोस्टमॉर्टम के आदेश दिए वर्ना जिस तरह आरोपी जज अपने रसूख का इस्तेमाल लगातार करती दिख रही थी, न्याय तो दूर, न्याय के रास्ते पर पहला कदम भी रखना मुश्किल लग रहा था.

लेकिन कुछ चिंतनीय बिंदु–

1–अक्सर जब FIR में देर होती है, क्राइन सीन से आरोपियों को सबूत मिटाने का मौका मिल जाता है.

2–अदालत में लड़ाई सबूतों पर ही होती है और अगर किसी केस में रसूखदारों के प्रभाव में पुलिस प्राथमिकी दर्ज करने और अनुसंधान में लापरवाही करती है, तब आगे चलकर पर्याप्त सबूत न रहने पर आरोपियों को इसका लाभ मिल जाता है..

3–पुलिस से जब मामला सीबीआई के पास जाता है, तब तक सबूत मिटाए जा चुके होते हैं..देश के कई मामले ऐसे हैं, जिनकी सीबीआई जांच में भी न्याय नहीं मिल सका…

4–जमशेदपुर में सांसद सुनील महतो हत्याकांड, मौसमी कांड जैसे कई मामले हैं, जहां सीबीआई जांच पर सवाल खड़े किए गए हैं..

5–जरुरत ऐसा सिस्टम बनाने की है जहां FIR दर्ज होने और क्राइम सीन को सील करने, सबूत एकत्रित करने में न कोई देर हो और न कोई ढिलाई बरती जाए…पुलिस तंत्र जिस प्रकार कार्य कर रहा है, वह लोगों को न्याय के रास्ते से दूर कर रहा है….

6–ट्विशा केस में पहले पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में चोटों का जिक्र है, फिर भी भोपाल के कमिश्नर आराम से निष्कर्ष निकालकर कहते दिखते(टीवी पर) हैं कि आत्महत्या है..इतनी जल्दी निष्कर्ष?

7-क्राइम रिपोर्टिंग के अपने अनुभवों के आधार पर मैं कह सकती हूं कि देश में पुलिस सुधार की सख्त जरूरत है..

पर,उससे पहले राजनीतिक सुधार की आवश्यकता है. राजनीतिक सुधार कैसे होगा जब हम असली मुद्दों पर वोट न करके धर्म और जाति के मुद्दे पर वोट देंगे…क्या कभी चुनाव में ये मुद्दा बनता है कि जनता को एक एफआईआर कराने और रिसीविंग के लिए दौड़ना पड़ता है…आम आदमी को परिवार समेत पुलिस पकड़ लेती है, लेकिन आरोपी रसूखदार हो तो पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में चोट का जिक्र होने पर भी पुलिस शक नहीं करती और सीधे आत्महत्या करार देती है. रसूखदार आरोपी को भागने का पूरा मौका देती है. अधिकांश जनता इन सब जरुरी मुद्दों के बारे में सोचती है?

सोचिए…नहीं सोचते तो सोचना शुरु कीजिए….किसी दूसरे राज्य में बन रहे मंदिर मस्जिद के मुद्दे पर अपने राज्य में खुश या नाराज होकर वोट न करें…असली मुद्दों को उठाने का साहस करनेवालों को बढ़ावा दें..नेताओं को मजबूर करें कि वे असली मुद्दे उठाएं…न कि नेता आपके बेवकूफ बनाएं..

हर चीज एक दूसरे से जुड़ी होती है..अगर पुलिस अच्छा काम नहीं करती तो उसके जड़ में जाइए…अपने गिरेबां में झांके..

 

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