SOCIAL MEDIA DAY
झारखंड में जब महिला पत्रकार की चर्चा होती है तो एक नाम अन्नी अम़ृता का नाम लेना नही भुलते है लोग. अपनी कई खबर के लिए चर्चा में रहे अन्नी अमृता इन दिनो बीमार है ।लेकिनबीमार होने के बाद भी उन्होने सोशल मिडीया की मदद से कई लोगो को कोविड के दौर में कई लोगो की हेल्प की
“सोशल मीडिया की कुछ कमियों(भ्रामक खबरें वगैरह)को
नज़रअंदाज़ कर दें तो यह जन-सेवा का जबर्दस्त माध्यम बना है, खासकर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्वीटर इस कोरोना काल में जिस तरह लोगों की मदद का सशक्त माध्यम बना वह यह बताने के लिए काफी है कि सोशल डिस्टेंसिंग के इस युग में बगैर उपस्थिति के भी कैसे मदद हो सकती है।वहीं मार्च में उनकी पहली पुस्तक कहानी संग्रह ‘ये क्या है’का विमोचन भी हुआ जिसकी चर्चा आज हर जगह होती है।
आज सोशल मीडिया डे पर उनकी बात इसलिए हो रही है क्योंकि कोरोना के सेकेंड वेभ के दौरान एक पत्रकार के रूप में वह ट्वीटर पर जबर्दस्त मददगार के रुप में
उभरी वह भी तब जब वह 22मार्च को स्वयं एक बड़े गाईनिक operation से गुजरीं।यह वही दौर था जब सेकेंड वेब की हल्की दस्तक शुरू हुई थी जो अप्रैल-मई में पीक तक गई।operation के बाद अगले एक डेढ़ महीने अन्नी अमृता के लिए अत्यधिक चुनौती भरे रहे क्योंकि बैठने की मनाही थी और आराम करने/टहलने पर ज़ोर था।ऐसे समय जब उन्हें मेडिकल लीव में जाना पड़ा, उन्होंने घर पर रहने का भरपूर सदुपयोग ट्वीटर/फोन के माध्यम से जन सेवा में किया।
उनकी ही जुबानी पढ़िए कि कैसे सिलसिला शुरू हुआ और कांरवा
बनता चला गया—-“मैं आराम कर रही थी और operation की वजह से अपने शारीरिक कष्ट से परेशान थी।संभवतया अप्रैल की शुरूआत हो चुकी थी।कोरोना के सेकेंड वेभ की शुरूआत में मैंने अपने मोबाईल और ट्वीटर पर एक केस देखा जिसमें बी प्लस ब्लड ग्रुप प्लाज्म़ा की मांग की गई थी।मैंने उसे तुरंत फोन और ट्वीटर पर forward करना शुरू किया और इस कड़ी में वे तमाम लोग सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर जुड़ते चले गए जो इस तरह की मदद में महती भूमिका निभा सकते थे।धीरे-धीरे अस्पतालों में बेड, आईसीयू-सीसीयू और oxygen सिलेंडर की आपाधापी शुरू हो गई और उस खतरनाक दौर में मैं चुपचाप अपने ट्वीटर अकांउट से@ मंंत्री चंपाई सोरेन, @KunalSarangi(प्रदेश भाजपा प्रवक्ता )@DCEast Singhbhum(सूरज कुमार, उपायुक्त , पूर्वी सिंहभूम) @BannaGupta76(स्वास्थ्य मंत्री, झारखंड) और अन्य लोगों से
ट्वीटर के माध्यम से मरीजों की मदद के लिए संपर्क साधती रही, रीट्वीट ,टैग , कोट(quote)का अनवरत चलने वाला सिलसिला चलता रहा।फोन और वाट्सएप से भी लगातार संपर्क मैंने साधे रखा।मामला सिर्फ टीएमएच समेत अन्य अस्पतालों में बेड या oxygen , ccu-icu की उपलब्धता की मदद से जुड़ा न था, lockdown की वजह से लोगों के समक्ष रोज़गार का संकट था जिससे अपने बच्चों की फीस भरना उनके लिए मुश्किल हो चला था।हमारे सामने ऐसी खबरों की भरमार थी जहां फीस न भर पाने पर online क्लास से बच्चों के नाम काटे गए या काटे जाने की नौबत थी।ऐसे मामलों में ट्वीटर एक सशक्त माध्यम बनकर आया।कई मामलों को मैंने शिक्षा सत्याग्रह के संस्थापक अंकित आनंद(@Ankitsatyagrahi)की मदद से ट्वीटर पर हाईलाईट
किया जिससे जिला शिक्षा विभाग हरकत में आया और बच्चों के नाम काटे जाने से बचे।वहीं एक दूसरे मामले ऐसे भी रहे जहां समाज के लोगों ने ट्वीटर देखकर बच्चों के फीस भरने की मदद की पेशकश कर दी।मुझे याद है कि आम तौर पर साकची में सड़क के किनारे झारखंडी व्यंजन का फूड stall लगाने वाली पूनम सिंह lockdown में दुकान न लगा पाने की वजह से कमाई के अभाव में अपने बच्चे की फीस नहीं भर पा रही थी, सामाजिक कार्यकर्ता संजय विश्वकर्मा ने फोटो के साथ ट्वीटर पर पूनम की व्यथा को मुझे टैग करते हुए पोस्ट किया।जब मैंने इसे रीट्वीट किया तो रीतेश मित्तल और टीम नम्या की निधि केडिया ने तुरंत मदद की पेशकश की और मदद कर दिया।पूनम सिंह ने मुझे खास धन्यवाद दिया।उसके अलावा अक्सर अस्पतालों, सड़कों या अन्य जगहों पर शव पड़े
रहने और कोरोना प्रोटोकॉल समेत कोरोना से भय की हालत में लोगों के आगे न आने पर मेरी तरफ से ट्वीटर के माध्यम से सरकार और जिला प्रशासन का ध्यान आकृष्ट कराकर समाधान की कोशिशें चलती रहीं।इसमें पत्रकार संतोष की भूमिका सराहनीय रही।अनगिनत कहानियां हैं शायद एक किताब भी कम पड़े अगर लिखूं।
बात सिर्फ जमशेदपुर तक सीमित न रही, पलामू के सामाजिक कार्यकर्ता सन्नी शुक्ला और धनबाद के अंकित राजगढ़िया जैसे युवाओं की मदद से पूरे झारखंड से आ रही मदद की पुकारों पर
मदद करने की कवायद चली जो आज भी जारी है।आज भी रोजाना लोग कभी इलाके के जलमीनार को ठीक करवाने की तो कभी अन्य चीजों की मदद की गुहार लोग ट्वीटर पर लगाते हैं जिसे संबंधित लोगों को रीट्वीट कर मदद की भरपूर कोशिश करती हूं।मदद होने पर अजीब सा सुकून मिलता है और सुखद एहसास देता है।जब लोग मेरा नं पता करके वाट्सएप पर धन्यवाद भेजते हैं तब मेरी आंखें भर जाती हैं।ट्वीटर पर मेरे योगदान की चर्चा इन लोगों के बगैर अधूरी है जिनकी मदद से मैं ये कर पा रही हूं—-पूर्व विधायक कुणाल षाडंगी, स्वास्थ्य मंत्री बन्ना
गुप्ता, पूर्वी सिंहभूम के उपायुक्त सूरज कुमार, शिक्षा सत्याग्रह के संस्थापक अंकित आनंद, सामाजिक कार्यकर्ता संजय विश्वकर्मा, मोहम्मद शमीम, अनुराग जायसवाल,पत्रकार सोहन सिंह, पत्रकार संतोष,जयदीप आईच टीम नम्या की निधि केडिया, ब्लड मैन के
नाम से जाने जानेवाले रांची के अतुल गेरा, पलामू के सन्नी शुक्ला, धनबाद के अंकित राजगढ़िया और अन्य कई लोग।मदद के इस दौर में जहां कई जिंदगियां जहां हम सबके प्रयास से बचीं वहीं कईयों को तमाम प्रयास के बावजूद नहीं बचाया जा सका।पत्रकार साथी पंकज की टीएमएच में मौत से बहुत टूटा महसूस किया था , लेकिन सच यही है कि इंसान अपना ही रोल कर सकता है और अपने अपने रोल के साथ हम सब मिलकर बहुत कुछ कर सकते हैं.””।
अंत में #TogetherWeCan
