
काण्ड्रा की धरती आज मौन है। वह व्यक्तित्व, जिसकी उपस्थिति मात्र से आत्मीयता जाग उठती थी, अब दृश्य पटल पर नहीं रहा। सुडौल तन का राजा, खुले मन का राजा, दानशीलता का राजा, गोपाल कृष्ण मालवीय, जिनकी आत्मा नश्वर देह से मुक्त होकर परमात्मा से मिलने की अनन्त यात्रा पर प्रस्थान कर गई।

इहलोक में जिन्हें कुशल व्यवसायी, चतुर रणनीतिकार, दूरदर्शी चिंतक और आस्तिक विचारधारा से ओत-प्रोत व्यक्तित्व के रूप में जाना गया, वे आज केवल स्मृतियों में शेष हैं। जिनके निर्णयों में विवेक था, जिनकी दृष्टि में भविष्य था और जिनके आचरण में समाज के प्रति उत्तरदायित्व की स्पष्ट झलक मिलती थी। ‘राजा’ नाम मात्र संबोधन नहीं था, वह एक भाव था, अपनत्व का, नेतृत्व का और विश्वास का।
भौतिक संसार में जिस सफलता की आकांक्षा एक सामान्य मनुष्य जीवन भर संजोए रखता है, उस शिखर तक पहुँच कर ‘राजा’ ने अभी उड़ान भरनी ही शुरू की थी कि विधाता ने उन्हें वापस बुला लिया। यह नियति का वह कठोर सत्य है, जिसे स्वीकार करना आसान नहीं, पर टालना असंभव है।
आज के आधुनिक और उन्नत चिकित्सा युग में, जहाँ असाध्य शब्द लगभग अर्थहीन होता जा रहा है, वहाँ भी ‘राजा’ काल के सम्मुख नतमस्तक हो गया। यह पराजय किसी व्यक्ति की नहीं, बल्कि मानव विवशता की है, उस सत्य की, जो यह सिखाता है कि जीवन उपलब्धि का नहीं, अर्थ और मूल्य का नाम है।
सच ही कहा गया है, ‘राजा’ केवल किसी परिवार का नहीं होता। वह समाज का होता है, क्षेत्र का होता है, और उन असंख्य लोगों का होता है, जिनके जीवन को उसने किसी न किसी रूप में स्पर्श किया होता है। गोपाल कृष्ण मालवीय ऐसे ही ‘राजा’ थे, जिनका जाना एक परिवार की नहीं, पूरे काण्ड्रा की क्षति है।
आज आँखें नम हैं, हृदय बोझिल है और शब्द असमर्थ। फिर भी स्मृतियों के दीप जलाकर हम उन्हें नमन करते हैं। परमात्मा दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें और शोकाकुल परिवार व समाज को इस अपूरणीय क्षति को सहने की शक्ति प्रदान करें।
✍️ मृत्युंजय बर्मन


