
राजकुमार झा
मधुबनी।
भादव मासक शुक्ल पक्षक चतुर्थी (चौठ) तिथिमे साँझखन चौठचन्द्रक पूजा होइत अछि ,जकरा लोक चौरचन पाबनि सेहो कहै छथि। पुराणमे प्रसिद्ध अछि, जे चन्द्रमा के अहि दिन कलंक लागल छलनि, ताहि कारण अहि समयमे चन्द्रमाक दर्शन के मनाही छैक। मान्यता अछि, जे एहि समयक चन्द्रमाक दर्शन करबापर कलंक लगैत अछि। मिथिला में अकर निवारण हेतु रोहिणी सहित चतुर्थी चन्द्रक पूजा कायल जाइत अछि ! स्कन्द पुराण के अनुसार एक बेर भगवान कृष्ण के मिथ्या कलंक लागल छल,लेकिन ओ अहि वाक्य सअ कलंक मुक्त भेलाह !
‘सिंह: प्रसेनमवधीत्, सिंहो जाम्बवता हत:।
सुकुमारक! मा रोदी:, तव एष स्यमन्तक:।।’
एक टा अन्य कथा के अनुसार , एक बेर गणेश भगवान के देखि चन्द्रमा हँसि देलखिन्ह । एहिपर गणेशजी चन्द्रमा के श्राप देलखिन्ह कि, जे अहाँ के देखत ओ कलंकित होयत। तखन चन्द्रमा भादव शुक्ल चतुर्थीमे गणेशक पूजा केलनि। ओ प्रसन्न भऽ कहलखिन्ह – अहाँ निष्पाप छी। जे व्यक्ति भादव शुक्ल चतुर्थी के अहाँक पूजा कऽ ‘सिंह प्रसेन…’ मन्त्रसँ अहाँक दर्शन करत ,तकरा मिथ्या कलंक नञि लगतै,आ ओकर सभ मनोरथ पुरतै। चन्द्रमा के दर्शन के समय हाथ में फल अवश्य राखी और मंत्र के साथ दर्शन करी !मिथिलाक अन्य पाबनि जकाँ अहु में खीर ,पूरी ,मधुर ,ठकुआ ,पिरिकिया,मालपुआ,दही आदि के व्यवस्था रहैत अछि !
एक नजरि मे चौठी चानक वृतांत !
स्कंद्पुराण मे वर्णित चौठी चानक तथ्य इ जे एक दिन नारद जी वसुंधरा पर एलाह जाहि क्रम मे घुमैत – घुमैत तीनो लोक के स्वामी भगवान कृष्ण सँ साक्षात्कार भए गेलन्हि , लेकिन चिन्तातुर उदास कृष्ण केँ देखि पुछलथिन्ह हे देवेश , किएक उदास छी ? कृष्ण कहलथिन्ह, हे नारद , हम वेरि वेरि मिथ्यापवाद सँ पीड़ित भऽ रहल छी ,नारद कहलथिन्ह, हे देवेश , अहाँ निश्चिदते भादो मासक शुक्ल चतुर्थीक चन्द्र देखने होएव तेँ अपने केँ बेरिबेरि मिथ्या कलंक लगैछ । श्री कृष्ण नारद सँ पूछलथिन्ह, चन्द्र दर्शन सँ किएक ई दोष लगै छैक ?
नारद जी कहलथिन्ह, जे अति प्राचीन काल मे चन्द्रमा गणेश जी सँ अभिशप्त भेलाह, अहाँक जे देखताह हुनको मिथ्या कलंक लगतैन्ह । कृष्ण पूछलथिन्ह, हे मुनिवर ! गणेश जी किऐक चन्द्रमा केँ शाप देलथिन्ह ? नारद जी कहलथिन्ह,हे यदुनन्दन, एक वेरि ब्रह्मा, विष्णु आओर महेश पत्नीक रुप मे अष्ट सिद्धि आओर नवनिधि के गनेश कें अर्पण कऽ प्रार्थना केयथिन्ह । गनेश प्रसन्न भऽ हुनका तीनू कें सृजन, पालन आओर संहार कार्य निर्विघ्न करु ई आशीर्वाद देलथिन्ह । ताहि काल मे सत्य लोक सँ चन्द्रमा धीरे-धीरे नीचाँ आबि अपन सौन्द्र्य मद सँ चूर भऽ गजवदन कें उपहास केलथिन्ह । गणेश क्रुद्ध भऽ हुनका शाप देलथिन्ह, – “हे चन्द्र अहाँ अपन सुन्दरता सँ इतरा रहल छी आई सँ जे अहाँ केँ देखताह, हुनका मिथ्या कलंक लगतैन्ह । चन्द्रमा कठोर शाप सँ मलीन भऽ जल मे प्रवेश कऽ गेलाह । देवता लोकनि मे हाहाकार भऽ गेल । ओ सब ब्रह्माक पास गेलथिन्ह । ब्रह्मा कहलथिन्ह अहाँ सब गणेशेक जा केँ विनति करु, उएह उपाय वतौताह । सव देवता पूछलन्हि-गणेशक दर्शन कोना होयत । ब्रह्मा वजलाह चतुर्थी तिथि केँ गणेश जी के पूजा करु । सब देवता चन्द्रमा सँ कहलथिन्ह । चन्द्रमा चतुर्थीक गणेश पुजा केलाह । गणेश वाल रुप मे प्रकट भऽ दर्शन देलथिन्ह आओर कहलथिन्ह – चन्द्रमा हम प्रसन्नम छी वरदान माँगू । चन्द्रमा प्रणाम करैत कहलथिन्ह हे सिद्धि विनायक हम शाप मुक्तक होई, पाप मुक्तह होई, सभ हमर दर्शन करैथ । गनेश जी कहलथि एव्मस्तु , लेकिन हमर शाप व्यर्थ नहि जायत किन्तु शुक्ल पक्ष मे प्रथम उदित अहाँक दर्शन आओर नमन शुभकर रहत तथा भादोक शुक्ल पक्ष मे चतुर्थीक जे अहाँक दर्शन करताह हुनका लोक लान्छना लगतैह । किन्तु यदि ओ ” सिंहः प्रसेन भवधीत ” इत्यादि मन्त्र केँ पढ़ि दर्शन करताह तथा हमर पूजा करताह हुनका ओ दोष नहि लगतैन्ह । श्री कृष्ण नारद सँ प्रेरित भऽ एहिव्रतकेँ अनुष्ठान केलाह तहन ओ लोक कलंक सँ मुक्त भेलाह आओर ओही समय सॅ ई “चौठी चान” पावनिक परम्परा आबि रहल अछि !

