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Home » जमशेदपुर -वीमेंस कॉलेज में संस्कृति, परंपरा और स्त्री-अस्तित्व का संघर्ष विषयक राष्ट्रीय वेबिनार संपन्न
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जमशेदपुर -वीमेंस कॉलेज में संस्कृति, परंपरा और स्त्री-अस्तित्व का संघर्ष विषयक राष्ट्रीय वेबिनार संपन्न

BJNN DeskBy BJNN DeskJuly 3, 2020No Comments5 Mins Read
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जमशेदपुर ।
वीमेंस कॉलेज में चल रही ई संगोष्ठियों (वेबिनार) की कड़ी में गुरूवार को नया अध्याय जुड़ा। संस्कृति, परंपरा और स्त्री-अस्तित्व का संघर्ष विषयक एक दिवसीय राष्ट्रीय वेबिनार में बतौर वक्ता माननीया विधायक श्रीमती सविता महतो और झारखण्ड राज्य महिला आयोग की पूर्व अध्यक्षा सह समाजशास्त्री व कथाकार डॉ. महुआ माजी ऑनलाइन शरीक हुईं। गूगल मीट ऐप्लीकेशन पर सुबह 11.30 बजे वेबिनार का शुभारंभ करते हुए प्राचार्या प्रो (डॉ.) शुक्ला महांती ने दोनों स्रोतविद् का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि यह वेबिनार इस मायने में अनूठा है कि बतौर स्रोतविद् ऐसी शख्सियतें शामिल हैं, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों के बीच से अपनी अलग पहचान बनाई है। इनके कार्यक्षेत्र परिवार, सक्रिय राजनीति, समाज और साहित्य सृजन तक विस्तृत हैं। विशुद्ध अकादमिक वक्तव्यों की जगह इनके प्रत्यक्ष अनुभवों को जानकर एक बेहतर समझ सभी में विकसित होगी, इसका भरोसा है। उन्होंने बताया कि वेबिनार का विषय हमारे समय का ज्वलंत मुद्दा है। अधिकांश भारतीय संस्कृति कुछेक अपवादों को छोड़कर प्रायः पितृसत्तात्मक रही है। पितृसत्तात्मक समाज ने अपनी सुविधा और अपने वर्चस्व के लिए संस्कृति के सभी उपादानों को कंडीशंड किया है। व्रत-त्यौहार से लेकर सामाजिक-आर्थिक उत्पादन में भी पुरुष वर्चस्व सुरक्षित रखा गया। उसे पति, पुत्र और पिता की सेविका के रूप में ही महान बताया गया। संवाद करती हुई, बौद्धिकता के ताप से पुरूष सत्ता को चुनौती देती हुई, युद्ध में रणकौशल दिखाती हुई स्त्री पितृसत्तात्मक नैतिकता को कभी हजम नहीं हुई और हर बार उसका दमन करने का प्रयास किया गया। स्त्री का ‘मैं’ कहीं खो जाता है। इसलिए यह बातचीत आधी आबादी को सांस्कृतिक और सामाजिक चेतना के स्तर पर भी बराबरी का दर्जा दिलाने के लिए सोचने को विवश करेगी, ऐसी हमें आशा है।

परिवार और राजनीति के बीच संतुलन जरूरी है- श्रीमती सविता महतो
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पहले वक्ता के रूप में शिरकत कर रहीं झारखण्ड विधानसभा की  विधायक श्रीमती सविता महतो ने कहा कि राजनीति में जाने का कोई ईरादा पहले से तो नहीं था लेकिन घटनाओं के चलते इधर आना पड़ा। क्षेत्र की जनता से सम्मान, स्नेह और समर्थन तो मिला ही, विधानसभा में भी उतना ही आदर मिला है। चार बेटियों की जिम्मेदारी लेते हुए राजनीति में सक्रिय रहना चुनौतीपूर्ण तो था लेकिन खुद बेटियों सहित सबके सहयोग से यह आसान होता गया है। मुझे गुरूजी, माननीय मुख्यमंत्री जी सहित सबका आशीर्वाद और सहयोग मिला और अब मैं मानती हूँ कि मेरे परिवार का दायरा पूरा झारखण्ड हो गया है। इसके भले के बारे में सोचना और काम करना मेरा कर्तव्य है। विकलांग महिलाओं के लिए सरकार की तरफ से क्या काम हो रहे हैं, एक प्रतिभागी के इस प्रश्न के जवाब में उन्होंने कहा कि इस पर तेजी से काम हो रहा है। लड़कियों की अच्छी शिक्षा, रोजगार और बेहतर स्वास्थ्य के लिए कई योजनाओं पर काम किया जा रहा है, जो धरातल पर दिखने लगा है।

स्त्री अस्तित्व के सवालों ने संस्कृति और परंपरा को पुनर्परिभाषित किया है– डॉ. महुआ माजी
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दूसरी वक्ता झारखण्ड राज्य महिला आयोग की पूर्व अध्यक्षा सह समाजशास्त्री व कथाकार डॉ. महुआ माजी ने कहा कि परंपरा एक जीवन मूल्य है जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तान्तरित होती रहती है। बदलाव की इस प्रक्रिया में सामाजिक और आर्थिक स्थितियों के चलते सांस्कृतिक स्वरूपों में भी परिवर्तन होता रहता है। इसलिए सभ्यता के विकास के अलग-अलग चरणों में संस्कृतियों के अलग अलग रूप दिखाई पड़ते हैं। वैदिक काल में संघमित्रा, अपाला, घोषा जैसी विदुषियों ने ज्ञान और संस्कृति के सभी क्षेत्रों में प्रभाव डाला है। यह सत्य है कि इतिहास के कई कालखंडों में ज्ञान के लगभग सभी स्रोतों से स्त्री को वंचित रखा गया। यह भी सत्य है कि स्त्री जैविक कारणों से पुरूष की अपेक्षा आर्थिक उत्पादन की प्रक्रिया में कम सक्रिय हो सकी। इसी को आधार बनाकर स्त्री पर नियंत्रण के प्रयास किये गये। सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया में जब स्त्री अधिकारों को लेकर कुछेक आवाजें उठीं तो उन्हें पुरुष निर्मित ज्ञान तंत्र ने देवी बनाकर एक चालाक समझौतावादी चरित्र थमा दिया। वह या तो देवी बनाई गई या दासी। वह सहचरी हो सकती है, मित्र हो सकती है, ऐसी परिकल्पना तक नहीं की गई। हालांकि इन्हीं सब चुनौतियों के बीच से स्त्रियों ने अपनी अदम्य जिजीविषा की बदौलत पितृसत्तात्मक ज्ञान के अभेद्य गढ़ में सेंध लगाई है। साहित्य, पत्रकारिता, दर्शन, विज्ञान, राजनीति से लेकर पुरुष वर्चस्व की सबसे बड़े एकाधिकार वाले क्षेत्र यानि खेल और सैन्य बल में भी पूरे दमखम के साथ उभरी हैं। उन्होंने परंपरा और संस्कृति को स्त्री अस्तित्व के संघर्षों से पैदा हुए जरूरी सवालों के माध्यम से पुनर्परिभाषित किया है।

प्रतिभागियों के सवालों का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि जनजातीय संस्कृतियां अपेक्षाकृत कम पितृसत्तात्मक रही हैं। यहां प्रकृति और स्त्री का स्वच्छंद साहचर्य रहा है। जनजातीय मिथक शास्त्र को देखें तो पायेंगे कि पुरुष के साथ स्त्री भी उतनी ही सक्रिय और हस्तक्षेपी भूमिका में रही है। इसलिए अब समय आ गया है कि हम अपनी संस्कृति का पुनर्पाठ करें। मुख्य धारा की संस्कृति ने जो पितृसत्तात्मकता का जाल बुना है, उसे ध्वस्त करने के लिए स्त्री को स्पेस देना ही समाधान है। जीवन को संचालित, नियमित व निर्धारित करने के लिए स्त्री सृजनात्मकता पर कायदे से बात होनी चाहिए। स्त्री को पुरुष द्वारा बनाई गई आचार संहिता से बाहर निकलकर अपनी बातें रखनी ही होगी। यह ध्यान रखते हुए कि स्त्री अस्तित्व व अस्मिता का सवाल केवल जेंडर डिस्कोर्स तक सीमित नहीं है बल्कि इसे आर्थिक और राजनीतिक पटल पर रखकर समझना होगा साथ ही सामाजिक समरसता के ताने-बाने को संभालते हुए आगे बढ़ना होगा।

 विधायक श्रीमती सविता महतो जी की सुपुत्री ने भी संक्षिप्त वक्तव्य दिया और बताया कि राजनीति में अब लड़कियों को भी आगे आना चाहिए और समाज तथा राज्य व राष्ट्र के विकास में रचनात्मक योगदान देना चाहिए।

वेबिनार का संचालन डॉ नुपुर अन्विता मिंज ने तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ रत्ना मित्रा ने किया। तकनीकी समन्वयन का कार्य बी विश्वनाथ राव व ज्योतिप्रकाश महांती ने किया। इस दौरान काॅलेज के शिक्षक-शिक्षिकाओं, शिक्षकेत्तर सहयोगियों, छात्राओं सहित स्थानीय स्तर पर व देशभर से लगभग 287 प्रतिभागी सीधे तौर पर जुड़े रहे।

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