
ब्रजेश भारती
सिमरी बख्तियारपुर।


सहरसा जिले के सिमरी बख्तियारपुर अनुमंडल के बाबा मटेश्वर धाम कांठो बलवाहाट में जलाभिषेक करने हेतु उमड़ती है शिव भक्तों की भीड़।
प्रसिद्ध श्रावणी मेला अपने अंतिम चरण में हैं। तीसरी सोमवारी बीत जाने के बाद भी अबतक कांवरिया पथ मानसी – सहरसा रेलखंड पर प्रशासनिक सुरक्षा समेत अन्य सुविधाये कि व्यवस्था नही हो सकी हैं। गत वर्ष इस पथ पर रेलपुल पार करने के दौरान टेन के आ जाने के कारण कोशी नदी में कांबरियों ने छलांग लगा कर अपनी जान गंवा दी थी। कावरिया व डाकबम को खगड़िया- सहरसा रेलखंड मार्ग से आने – जाने में दुर्घटना की आशंका सताते रहती है।रविवार की रात भी हजारों कांबरियों इस रास्ते से जलकर भर कर मटेश्वरधाम पहुंचे हैं।
सहरसा-खगड़िया प्रशासन कांवरिया पथ के लिए सजग नहीं –
सहरसा जिले के सिमरी बख्तियारपुर अनुमंडल मुख्यालय से महज 10 किलोमीटर दुरी पर अवस्थित बाबा मटेश्वर धाम कांठो – बलवा हाट में हर वर्ष प्रसिद्ध श्रावणी मेला के अवसर पर मुंगेर जिले के छर्रा पट्टी गंगा नदीं घाट से कांवरिया व डाकबम की टोली जल भरकर खगड़िया , मानसी , बदला घाट, धमारा घाट, फनगो हाॅल्ट, कोपरिया रेलवे स्टेशन, गोरगामा रेलवे ढ़ाला तक सहरसा – मानसी रेलखंड के पथरिली मार्ग होकर जलाभिषेक करने पहुंचते है। इस रेलखंड मार्ग में कांवरिया डाकबम व अन्य शिव भक्तों को कई पुराने जर्जर नग्न रेलपुल होकर गुजरने पर दुर्घटना की आशंका लगी रहती है। कई बार कावरिया दुर्घटना के शिकार भी हो चुके है। फीर भी रेल प्रशासन व सहरसा एवं खगड़िया जिला प्रशासन का ध्यान इस और आकृष्ट नहीं हो पाता है। जबकि पिछले वर्ष भी रेल पुल से डाक व कावरिया बम निचे पानी में गिर चुका है। हर वर्ष कांवरियों को कांवरिया पथ में परेशानियों का सामना करना पड़ता है। हलांकि स्थानीय लोगों ने सहरसा एवं खगड़िया जिला प्रशासन डीएम से कांवरिया पथ में सुरक्षा व आवागमन सुलभ कराने की मांग की है।
स्वयं अंकुरित है बाबा मटेश्वर धाम का शिवलिंग-
मिनी बाबा धाम के रूप में प्रसिद्ध बाबा मटेश्वर धाम की महिमा अपार है। पर यहां जल चढ़ाने के लिए हजारों शिव भक्तों की भीड़ उमड़ती है। मटेश्वर धाम का अनोखा शिवलिंग स्वयं अंकुरित है। यह शिवलिंग 14वीं शताब्दी की बतायी जाती है। समतल जमीन से 30-40 फीट उंचे टीले पर स्थापित काला पत्थर के शिवलिंग की मोटाई करीब 4 फीट तथा ऊंचाई ढ़ाई फीट है। शिवलिंग के चारों तरफ एक इंच की चैड़ाई में खाली स्थान है। गर्मी के मौसम में खाली स्थान पानी से लबालब भरा रहता है। जबकि बरसात में इसका जलस्तर काफी नीचे चला जाता है। वर्ष 2003 में शंकराचार्य बासुदेवानंद सरस्वती ने इस शिवलिंग का दर्शन कर कहा था कि ऐसा अद्भूत शिवलिंग मैंने पहली बार देखा है। यह दुनिया का अनोखा शिवलिंग है। बताया जाता है कि यह मंदिर पत्थर से निर्मित था। लेकिन औरंगजेब शासन काल में इसे तोड़ दिया गया था। अभी भी मंदिर के अवशेष प्रांगण में है।
मंदिर का नये सिरे से हुआ निर्माण –
करीब सौ साल पहले बघवा गांव के सत्यदेव राय को भगवान शिव स्वप्न में आये थे। उसके बाद उन्होंने मंदिर का निर्माण कराया। मंदिर परिसर के चारों तरफ जब समय-समय पर खुदाई की गयी तो पुरानी मूर्तियां पत्थर एवं अन्य निर्मित सामान मिले थे। वर्तमान में मटेश्वर धाम के चारों तरफ करीब 22 एकड़ जमीन है। मंदिर के ठीक सामने सौ मीटर की दूरी पर अवस्थित पोखर है। जिसकी खुदाई करने के क्रम में 9 कुएं मिले थे। कहा जाता है कि एक गुंगा साधू मुशहरू दास मंदिर के दक्षिण दिशा में खुदाई करने के लिए हमेशा इशारे से प्रेरित किया करते थे। जब ग्रामीणों द्वारा खुदाई की गयी तो एक से एक पत्थर एवं बहुमूल्य मूर्ति मिली। वर्ष 2007 में पुरातत्व विभाग के निदेशक डॉ. फनीकांत मिश्र द्वारा मटेश्वर धाम का भ्रमण करने के क्रम में मंदिर परिसर की खुदाई से निकले सामान देख आश्चर्य व्यक्त किया था। उन्होंने भगवान शनि की मूर्ति को भारत का दूसरा मूर्ति बता कर इस मटेश्वर धाम को सेटेलाईट के माध्यम से भारत के मानचित्र पर लाने का आश्वासन दिया था। शिव पुराण में है चर्चा रू- शिव पुराण में बाबा मटेश्वर का नाम मृत्येश्वर के नाम से वर्णित है जो सृष्टि में एक है। ग्रामीण लोग पहले बुढ़वामठ कहा करते थे। वर्ष 1997 में पहली बार कावंरिया बम की शुरूआत की। मटेश्वर धाम से 80 – 90 किमी दूर मुंगेर के छर्रापट्टी गंगा नदी घाट से जल भरकर खगड़िया, मानसी बदला घाट, कात्यायनी स्थान, धमारा घाट, कोपरिया स्टेशन, गोरगामा ढ़ाला तक रेल पटरी के किनारे पत्थरनुमा पगडंडी पर कष्टदायक यात्रा कर सिमरी बख्तियारपुर के रास्ते मटेश्वरधाम पहुंच कर अद्भूत शिवलिंग पर जलाभिषेक एवं पूजा-अर्चना करते ळें


