
रांची / देवघर: बदलते मौसम, अनिश्चित मानसून और सूखे जैसी विकट परिस्थितियों के बीच झारखंड के किसानों के लिए देवघर (Deoghar) से एक बेहद प्रेरणादायक खबर सामने आई है। बारिश पर निर्भरता, सिंचाई की बढ़ती लागत और मजदूरी की चुनौतियों से निपटने के लिए देवघर जिले के पंसारी गांव (Pansari Village) के किसानों ने श्रम-प्रधान पारंपरिक खेती को छोड़कर ‘जलवायु-अनुकूल खेती’ (Climate-resilient farming) की ओर सफलतापूर्वक कदम बढ़ाया है। गांव के प्रगतिशील किसान अवध बिहारी सिंह की पहल और ‘डायरेक्ट सीडेड राइस’ (DSR) तकनीक के इस्तेमाल से आज पंसारी गांव की पूरी तस्वीर बदल गई है, जिससे खेती की लागत घटने के साथ-साथ बंपर उत्पादन भी हो रहा है।


मानसून पर निर्भरता और मजदूरी बनी थी बड़ी चुनौती
देवघर के पंसारी गांव में दशकों से धान की खेती पूरी तरह मानसून (Monsoon) पर निर्भर रही है। बेमौसम बारिश या समय पर बारिश नहीं होने के कारण किसानों को ट्यूबवेल, पंप और अन्य महंगे सिंचाई संसाधनों का सहारा लेना पड़ता था। इससे न केवल खेती की लागत (Input Cost) काफी बढ़ जाती थी, बल्कि मजदूरी के खर्चे के कारण किसानों पर भारी आर्थिक दबाव भी आ जाता था। इस समस्या के स्थायी समाधान के लिए गांव के किसान अवध बिहारी सिंह ने स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) के वैज्ञानिकों से संपर्क किया।
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क्या है DSR तकनीक जिसने बदल दी खेती की दिशा?
KVK के वैज्ञानिकों की सलाह पर अवध बिहारी सिंह ने डायरेक्ट सीडेड राइस (DSR) तकनीक अपनाई।
कैसे होती है खेती: इस तकनीक में धान के पौधों की पारंपरिक रोपाई (कदवा) करने के बजाय, बीजों को सीधे खेत में बोया (Direct Sowing) जाता है।
पानी और पैसे की बचत: किसानों के प्रत्यक्ष अनुभव के अनुसार, डीएसआर तकनीक से धान की खेती में 35 से 40 प्रतिशत तक पानी की बचत हुई है। साथ ही रोपाई में लगने वाले भारी श्रम और मजदूरी की आवश्यकता में भी भारी कमी आई है।
बायर का सहयोग और सीड ड्रिल मशीन बनी ‘गेमचेंजर’
कृषि वैज्ञानिकों के माध्यम से किसान अवध बिहारी सिंह को ‘बायर डायरेक्टएकर्स’ (Bayer DirectAcres) प्लेटफॉर्म से जोड़ा गया।
यहां उन्हें उच्च स्तरीय कृषि सलाह, मशीनीकरण, स्थानीय रिटेलर्स से संपर्क और डिजिटल टूल्स की सुविधा प्राप्त हुई।
डायरेक्टएकर्स के डीना (Deena) व्हाट्सऐप चैटबॉट के जरिए उन्होंने डीएसआर उपकरणों की जानकारी ली और बुवाई के लिए सीड ड्रिल मशीन (Seed Drill Machine) खरीदी।
अवध बिहारी ने अपनी मशीन से न सिर्फ अपने खेत में बल्कि दूसरे किसानों के खेतों में भी बुवाई कराई, जिससे उनके लिए अतिरिक्त आय (Extra Income) का स्रोत भी बन गया।
एक पहल से 70 एकड़ तक पहुंचा रकबा: साल 2024 में मात्र दो एकड़ से शुरू हुआ डीएसआर का यह प्रयोग, बेहतरीन फसल और पानी की कम खपत को देखते हुए, 2025 तक पूरे गांव में फैल गया और आज इसका रकबा बढ़कर 70 एकड़ तक पहुंच चुका है। पंसारी गांव की यह सफलता की कहानी इस बात का प्रमाण है कि सही तकनीक, वैज्ञानिक सलाह और दृढ़ इच्छाशक्ति से कृषि क्षेत्र की बड़ी चुनौतियों का भी समाधान निकाला जा सकता है।

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