महेंद्र प्रसाद, सहरसा
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अब तो मध्याह्न भोजन के चावल के बोरे पर भी विभागीय उच्चाधिकारी की नजर चली गई है। अब तक के बोरे का हिसाब गुरू जी को देना पड़ जायेगा। इस मामले को लेकर निदेशक मध्याह्न भोजन योजना ने सख्त निर्देश जारी किये हैं। ऐसे में जहां सिरदर्द साबित हो रहा है गुरु जी के लिये पीछे के बोरे का हिसाब, वहीं विभाग के लिये भी ये आसान नहीं होगा।दिए निर्देश के आलोक में एमडीएम के लिए आने वाले चावल के बोरों को खाली होने के बाद अब बेचा जाएगा। बिक्री से प्राप्त राशि को पंजी में दर्ज किया जाएगा। इस संबंध में जानकारी देते हुए बीएओ ने ने बताया कि एमडीएम निदेशक के निर्देश के आलोक में जिले में एमडीएम की संचालित योजना के अंतर्गत आने वाले चावल या अन्य सामग्री के खाली बोरों की बिक्री कार्य जल्द ही शुरू कर दी जाएगी। बिक्री के उपरांत प्राप्त राशि को एमडीएम के खाता में जमा कर उसे एमडीएम पंजी में दर्ज किया जाएगा। निर्देश के मुताबिक चावल के खाली बोरी प्रति दस रूपये की दर से बेची जाएगी। इस क्रम में पूर्व में खाली बोरों को एकत्रित कर बेचने की भी योजना है।
– निर्देशों का शत-प्रतिशत पालन करना मुश्किल
जारी आदेश पत्र पर गौर करें तो पूर्व में भी एमडीएम चावल मद में उपलब्ध बोरों को बेच कर राशि संबंधित खाता में जमा करना है। जिले में वर्ष 2007 से यह योजना क्रियान्वित है। इतने दिनों के बोरे का हिसाब-किताब लगाना आसान नहीं है। जबकि सरजमीनी सच्चाई है कि चावल खाली होते ही गुरूजी के द्वारा बोरों को रफा-दफा कर दिया जाता था। किसी विद्यालय में 50 बोरा भी मिल जाए यह संभव नहीं है। ऐसी स्थिति में प्रधान की मुश्किलें बढ़ना लाजिमी है। इस संबंध में विभागीय अधिकारी भी खुल कर बोल नहीं रहे हैं। 2007 से कई विद्यालय के प्रधान बदले। कई सेवानिवृत भी हो गए। ऐसी स्थिति में पूर्व के खाली बोरा का हिसाब लेना मुश्किल नजर आता है। दूसरी बात है कि 50 किलोग्राम का बोरा निर्धारित दर पर बिक जाए यह भी मुश्किल सा दिख रहा है। जबकि यहां के बाजारों में आसानी से 15 से 17 रुपये में एक क्विंटल का बोरा उपलब्ध हो जाता है।




