
आनंद सिंह

जमशेदपुर पश्चिम के विधायक सरयू राय इन दिनों फिर सुर्खियों में हैं। इस बार वह सुर्खियों में आए हैं ट्रेनों की लेटलतीफी को लेकर अपनी मांग पूरी करवाने को लेकर। बीते 27 मई को दक्षिण पूर्व रेल जोन के महाप्रबंधक अनिल कुमार जैन के साथ बैठक में सरयू राय ने न सिर्फ टाटानगर से आने-जाने वाली ट्रेनों की लेटलतीफी के मसले को आक्रामक तरीके से रखा बल्कि यात्री ट्रेनों को रोक कर मालगाड़ियों को आगे बढ़ाने पर भी अपनी नाराजगी जारी की। जीएम श्री जैन ने उसी वक्त यह निर्देश दिया कि आज से ही यह सुनिश्चित किया जाए कि कोई भी मालगाड़ी, यात्री ट्रेनों के बाद ही खोली जाए। यानी, पहले जो चार-चार, पांच-पांच मालगाड़ियां एक के बाद एक छोड़ी जाती थीं और यात्री ट्रेन किसी कोने में लगा दी जाती थीं, वो अब नहीं होगा। जीएम के इस निर्देश पर रेल यात्री संघर्ष समिति के संयोजक शिव शंकर सिंह ने प्रतिप्रश्न किया कि हम लोगों को कैसे पता चलेगा कि मालगाड़ियों को तवज्जो नहीं दी जा रही है, श्री जैन ने उसी वक्त एक और नया निर्देश जारी किया कि एक ऐसे अफसर की नियुक्ति करें जो ट्रेनों की लेटलतीफी को तो चेक करे ही, यह भी देखें कि यात्री ट्रेनों के उपर मालगाड़ी को तवज्जो न दिया जाए। यह अफसर प्रतिदिन रेल यात्री संघर्ष समिति और प्रेस के लोगों के साथ जानकारी साझा करेगा।
50 दिनों में ट्रेनों की लेटलतीफी का समाधान करवाना कोई खेल नहीं!
रेल यात्री संघर्ष समिति अभी भी निश्चिंत नहीं, चौकसी जबरदस्त
48 घंटों के भीतर अबीर मिश्रा की नियुक्ति सरयू राय की धमक को ही रेखांकित करती है!
7 अप्रैल 2026 को, जब ट्रेनों की लेटलतीफी को लेकर पहली बार रेलवे स्टेशन परिसर में धरना का आयोजन किया जा रहा था, तब आजसू के जिलाध्यक्ष कन्हैया सिंह ने एक मार्के की बात कही थी। उन्होंने कहा था कि रेलवे को पता नहीं है कि आज धरने पर बैठा कौन है। इतिहास गवाह है कि विधायक सरयू राय जब किसी मुद्दे को हाथ में लेते हैं तो जब तक उसका समाधान नहीं होता, तब तक उसे छोड़ते नहीं। कमोबेश यही बातें आफताब अहमद सिद्दिकी ने भी अपने भाषण में कही थी। तब शायद रेलवे को अंदाज नहीं था कि यह आंदोलन इतना तीखा हो जाएगा कि रेलवे के महाप्रबंधक को सरयू राय से बात करने के लिए संदेशा भेजना होगा।
सरयू राय ने 7 अप्रैल को तो अपने दम पर ही धरना का आयोजन किया था। उन्हें इसकी गंभीरता का भरपूर अंदाजा था। अतः 7 अप्रैल को ही उन्होंने धरनास्थल से कहा था कि यह आंदोलन बड़ा और तीखा होने वाला है। जल्द ही एक संघर्ष समिति बनाई जाएगी और उसका एक पूरा स्ट्रक्चर तैयार होगा। उन्होंने मिलानी हॉल में जनता के कहने पर दिये गये नाम रेल यात्री संघर्ष समिति को मान्यता दी और इसका संयोजक शिव शंकर सिंह को बनाया गया। बाद के दिनों में रेल यात्री संघर्ष समिति ने साकची, बर्मामाइंस, मानगो में लगातार तीन दिनों तक हस्ताक्षर अभियान चलाया और 24 मई को जमशेदपुर की परिधि से निकलकर, चक्रधरपुर मंडल से निकल कर घाटशिला पहुंच गए। घाटशिला खड़गपुर रेल जोन में आता है। इस प्रकार, आंदोलन की तपिश चक्रधरपुर रेल मंडल से निकल कर खड़गपुर रेल मंडल तक पहुंच गई। घाटशिला में जिस तरीके से लोगों ने रेल यात्री संघर्ष समिति को पहली ही बार में सिर-माथे पर बिठाया, भारी भीड़ उमड़ी, यात्रियों की करुण वेदना सामने आई, उसने इस आंदोलन की धार को और आगे बढ़ा दिया। जमशेदपुर से लेकर घाटशिला तक जिस चरणबद्ध तरीके से आंदोलन तीखा होता गया, वह सरयू राय की रणनीति का ही कमाल है।
बतौर पत्रकार, इस आंदोलन से मैं प्रत्यक्ष रुप से जुड़ा रहा। सभास्थलों पर आने वाले लोगों से बातचीत में यह महसूस हुआ कि पब्लिक का मोमेंटम पूरी तरह सरयू राय के साथ जुड़ा हुआ है। मुझे यह भी महसूस हुआ कि अगर जल्दी ही रेल प्रशासन अपने झूठे अहंकार को त्याग कर बातचीत का रास्ता नहीं निकालता तो हालात खराब हो सकते थे। लेकिन, रेल महाप्रबंधक अनिल कुमार जैन ने संभवतः उन रिपोर्टों और फीडबैक पर गौर किया, जो 7 अप्रैल से 26 मई तक उन्हें हस्तगत हुए थे। संभवतः उन्होंने यह महसूस किया होगा कि अगर हालात बिगड़े तो संभालना मुश्किल होगा। क्योंकि, रेल यात्री संघर्ष समिति ने हर सभा में इस बात को मजबूती से रखा था कि अगर हमारी बातें नहीं सुनी गईं तो रेल पटरियों पर भी बैठने का विकल्प खुला है। इसके इतर रेलवे की जो राष्ट्रीय स्तर पर बदनामी हो रही थी, वह भी बहुत बड़ा सवाल बन रहा था।
बहरहाल, रेल जीएम की घोषणा के बाद सरयू राय ने रेल यात्री संघर्ष समिति के लोगों के साथ एक और बैठक की और कहा कि जीएम की घोषणा का अनुपालन कितना हो रहा है, इसके लिए समिति हफ्ते भर चीजों को देखेगी, समझेगी। आंदोलन खत्म नहीं हुआ है। यह परीक्षण का दौर है। अगर घोषणा पर दमदार तरीके से अमल नहीं होता तो दिल्ली कूच की भी संभावना है। समिति पूरी मुस्तैदी से चीजों को देखती रहेगी।
इस पूरे एपिसोड में मुझे 7 अप्रैल का वह दृश्य भी स्मरण हो रहा है, जिसमें सुबह 11 बजे चिलचिलाती धूप में सरयू राय और उनके आंदोलनकारी साथी लगातार तीन घंटे तक धरना पर बैठे थे। 7 अप्रैल को रेल प्रशासन किस कदर क्रूर हो गया था, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने पहले से तय धरनास्थल की तरफ आंदोलनकारियों को जाने भी नहीं दिया। वहां आरपीएफ के हथियारबंद जवानों को तैनात कर दिया था। चारों तरफ रस्से से बैरिकेडिंग कर दी गई थी। उनकी मंशा थी कि यह धरना हो ही नहीं। हो भी तो फ्लॉप हो जाए। इसके लिए उन्होंने रेलवे स्टेशन के दाहिनी तरफ खड़े रेल इंजन के पास वाला इलाका दिया और कहा कि यहीं पर धरना दीजिए। नाराज आंदोलनकारियों ने इसका तीखी विरोध किया और फिर 100 मीटर पहले, पार्किंग स्पेस के पास धरना का आयोजन हुआ। आधे लोग पेड़ की छांव में थे, लेकिन सरयू राय और 20-25 अन्य आंदोलनकारी चिलचिलाती धूप में बैठे थे। सरयू राय और उनके साथी लगातार तीन घंटे तक बिना उठे-हिले-डुले वहीं बैठे रहे। पसीने से तर-बतर। पानी पीते रहे, लेकिन हिले नहीं। इस दृश्य ने आम लोगों को भी प्रभावित किया। 7 अप्रैल 2026 को आरपीएफ के एक सब इंस्पेक्टर ने मुझसे कहा था-विधायक जी इतने बुजुर्ग हैं। एक छाता तो उनके उपर डाल देते रेलवे वाले। मेरे पिता की उम्र के हैं। ये अपने लिए थोड़े कर रहे हैं। हम सबके लिए कर रहे हैं। हम लोग भी ट्रेनों की लेटलतीफी से आजिज आ गए हैं। मैं नौकरी में हूं, इसलिए कुछ बोल नहीं सकता। सरकारी नियम के कारण मेरा मुंह बंद है लेकिन मेरा नैतिक समर्थन विधायक जी को है। वह अच्छा कर रहे हैं और सही मांग कर रहे हैं। वह जरूर सफल होंगे।
76 साल की उम्र में तीन घंटे चिलचिलाती धूप में बैठना, एक बार भी उठना नहीं, सामान्य बात नहीं है। लेकिन, सरयू राय तो हर बार असामान्य ही करते हैं। रेल महाप्रबंधक से एक झटके में यात्री ट्रेनों को मालगाड़ियों पर वरीयता दिलवाना तब असामान्य प्रतीत होता है, जब आप इसकी उम्मीद छोड़ चुके होते हैं। तीन साल से यह सारा कुछ चल रहा था और कुछ हो नहीं रहा था। जब सरयू राय ने कमान अपने हाथ में ली तो 7 अप्रैल से 27 मई यानी कुल 50 दिनों में ही समाधान सामने आ गया। और तो और, महाप्रबंधक से बातचीत का परिणाम भी सामने आ गया है। नई जानकारी के अनुसार, दक्षिण पूर्व रेलवे के चक्रधरपुर डिविजन के कमर्शियल इंस्पेक्टर अबीर मिश्रा को टाटानगर में यात्री रेलगाड़ियों की लेट-लतीफी को दूर करने के लिए पूर्णकालिक पीआरआई (पब्लिक रिलेशन इंस्पेक्टर) नियुक्त कर दिया गया है। महज 48 घंटों में इस नियुक्ति को सरयू राय और रेल यात्री संघर्ष समिति द्वारा किए गए आंदोलन की सफलता के रूप में रेखांकित किया किया गया है।
है न असामान्य!


